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महत्वपूर्ण प्रश्न

272 सवाल
अक़ीदा खंड42

प्रश्न 1: तुम्हारा रब कौन है?

उत्तर- मेरा रब अल्लाह है, जो अपनी नेमतों से हमें एवं सारे संसारों को पालता है।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: (الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ) "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है''। [सूरा अल-फ़ातिहा: 2]

प्रश्न 2: तुम्हारा धर्म किया है?

उत्तर- मेरा धर्म इस्लाम है, और इस्लाम का मतलब है, ख़ुद को तौह़ीद के ज़रिए अल्लाह के हवाले करना, उसके आदेशों का पालन करना और शिर्क (बहुदेववाद) एवं मुश्रिकों से अलग हो जाना।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (إِنَّ الدِّينَ عِنْدَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ) "निःसंदेह अल्लाह के निकट धर्म केवल इस्लाम है"। [सूरा आले-इमरान: 19]

प्रश्न 3: तुम्हारा नबी कौन है?

उत्तर- मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ ٱللَّهِۚ) ''मुह़म्मद अल्लाह के रसूल हैं''। [सूरा अल-फ़तह: 29]

प्रश्न 4: कलेमा-ए-तौहीद एवं उसके अर्थ का उल्लेख करें?

उत्तर- कलेमा-ए-तौहीद: ''ला इलाहा इल्लल्लाहु'' है, और इसका अर्थ है: अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ) "तथा जान लो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है"। [सूरा मुहम्मद: 19]

प्रश्न 5: सर्वोच्च अल्लाह कहाँ है?

उत्तर- अल्लाह आसमान के ऊपर, अर्श एवं सभी सृष्टियों से बुलंद है। अल्लाह तआला ने कहा है: (الرَّحْمَنُ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى) ''रहमान (अत्यंत कृपाशील) अर्श पर स्थिर है''। [सूरा ताहा: 5] और कहा: (وَهُوَ ٱلۡقَاهِرُ فَوۡقَ عِبَادِهِۦۚ وَهُوَ ٱلۡحَكِيمُ ٱلۡخَبِيرُ) ''तथा वही अपने बंदों पर ग़ालिब (हावी) है और वही पूर्ण हिकमत वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है''। [सूरा अल-अन्आम: 18]

प्रश्न 6: इस गवाही का क्या अर्थ है कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं?

उत्तर- इसका अर्थ है: अल्लाह ने उन्हें सारे संसार के लिए शुभ संदेश देने वाला एवं डराने वाला बनाकर भेजा है।
तथा वाजिब है:
1- उनके दिए गए आदेशों का पालन करना।
2- उनके द्वारा दी गई ख़बरों को सच मानना।
3- उनकी अवज्ञा न करना।
4- अल्लाह की उसी तरह इबादत करना जैसा कि उन्होंने बताया है, और वह है सुन्नत का पालन करना एवं बिद्अत को त्याग देना।
अल्लाह तआला ने कहा है:
(مَنْ يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ) ''जिसने रसूल का आज्ञापालन किया तो उसने अल्लाह का आज्ञापालन किया''।[सूरा अल-निसा: 80], पाक अल्लाह ने एक स्थान पर कहा है: (وَمَا يَنْطِقُ عَنِ الْهَوَى 3 إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى 4) ''वह (रसूल) अपनी तरफ से कुछ नहीं कहते हैं, वह जो भी कहते हैं वह वह्यी होती है, जो अल्लाह की ओर से उनकी ओर भेजी जाती है''। [सूरा अल-नज्म: 3,4] महान एवं उच्च अल्लाह ने एक जगह कहा: (لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِمَنْ كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا) "तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम आदर्श है, उसके लिए, जो आशा रखता हो अल्लाह और अंतिम दिन (प्रलय) की, तथा याद करे अल्लाह को अत्यधिक"। [सूरा अल-अहज़ाब: 21]

प्रश्न 7: अल्लाह ने हमें क्यों पैदा किया है?

उत्तर- अल्लाह ने हमें किसी को उसका साझी बनाए बिना केवल अपनी पूजा करने के लिए पैदा किया है।
मस्ती और खेल-कूद के लिए नहीं।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ) "मैंने जिन्नों और इन्सानों को मात्र इसी लिए पैदा किया है कि वे केवल मेरी इबादत करें''। [सूरा अल-ज़ारियात: 56]

प्रश्न 8: इबादत क्या है?

उत्तर- इबादत एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है, जिसके अंदर वह सारे गुप्त तथा व्यक्त कथन और कार्य आ जाते हैं, जिन्हें अल्लाह पसंद करता है और जिनसे वह प्रसन्न होता है।
व्यक्त या ज़ाहिरी इबादत:
जैसे ज़ुबान से अल्लाह की पाकी, प्रशंसा एवं बड़ाई बयान करके अल्लाह को याद करना, नमाज़ पढ़ना एवं हज्ज करना आदि।
गुप्त इबादत:
जैसे अल्लाह पर भरोसा करना, उससे डरना एवं उससे उम्मीद रखना।

प्रश्न 9: हम पर सबसे बड़ी वाजिब चीज़ क्या है?

उत्तर- हम पर सबसे बड़ी वाजिब चीज़ तौहीद (अर्थात अल्लाह को एक जानना) है।

प्रश्न 10: तौहीद के कितने प्रकार हैं?

उत्तर- (तौहीद (एकेश्वरवाद) के तीन प्रकार हैं), 1- तौहीद-ए- रुबूबियतः अर्थात इस बात पर ईमान कि अल्लाह ही पैदा करने वाला, जीविका देने वाला, मालिक एवं प्रबंध करने वाला है, वह अकेला है एवं उसका कोई साझी नहीं है।
2- तौहीद-ए-उलूहियत: इसका अर्थ है केवल एक अल्लाह की इबादत करना एवं उसके अलावा किसी और की इबादत न करना।
3- तौहीद-ए-अस्मा व स़िफात: क़ुरआन व हदीस़ में उल्लेखित अल्लाह के नामों एवं विशेषताओं पर ईमान लाना, बिना किसी से उसको उपमा देते हुए एवं सादृश्य ठहराए हुए या किसी (नाम अथवा विशेषता) को रद्द किए हुए।
तीनों तौहीद के प्रकारों की दलील अल्लाह तआला का यह फरमान है: (رَّبُّ ٱلسَّمَـوَ ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ وَمَا بَيۡنَهُمَا فَٱعۡبُدۡهُ وَٱصۡطَبِرۡ لِعِبَـدَتِهِۦۚ هَلۡ تَعۡلَمُ لَهُۥ سَمِيًّا) ''आकाशों तथा धरती का रब तथा जो उन दोनों के बीच है। अतः उसी की इबादत करें तथा उसकी इबादत पर डटे रहें। क्या आप उसके समक्ष किसी को जानते हैं''? [सूरा मर्यम: 65]

प्रश्न 11: सबसे बड़ा गुनाह क्या है?

उत्तर: अल्लाह तआला के साथ शिर्क करना:
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدِ افْتَرَى إِثْمًا عَظِيمًا) "निःसंदेह अल्लाह यह क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और उसके सिवा जिसके लिए चाहे, क्षमा कर देगा। जो अल्लाह का साझी बनाता है, तो उसने महा पाप गढ़ लिया"। [सूरा अल-निसा: 48]

प्रश्न 12: शिर्क एवं उसके प्रकारों का उल्लेख करें?

उत्तर- शिर्क: किसी भी प्रकार की बंदगी का प्रदर्शन अल्लाह के अतिरिक्त किसी और के लिए करना है।
शिर्क के प्रकार:
बड़ा शिर्क: जैसे अल्लाह के अतिरिक्त किसी और को पुकारना, किसी गैर को सज्दा करना, उसके लिए जानवर ज़बह करना।
छोटा शिर्क:
जैसे अल्लाह के अलावा किसी और की क़सम खाना, ताबीज़ पहनना. और ताबीज़ पहनने का अर्थ है किसी लाभ को प्राप्त करने या किसी नुकसान से दूर रहने हेतु किसी भी चीज़ को लटकाना। इसी प्रकार कम मात्रा में रियाकारी (दिखावा, पाखण्ड), जैसा कि किसी को दिखाने के लिए अच्छी तरह नमाज़ पढ़ना।

प्रश्न 13: क्या अल्लाह के अलावा कोई परोक्ष (ग़ैब) को जानता है?

उत्तर- अल्लाह के अलावा कोई परोक्ष को नहीं जानता है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (قُل لَّا يَعۡلَمُ مَن فِي ٱلسَّمَـوَ ⁠تِ وَٱلۡأَرۡضِ ٱلۡغَيۡبَ إِلَّا ٱللَّهُۚ وَمَا يَشۡعُرُونَ أَيَّانَ يُبۡعَثُونَ) ''आप कह दें कि आकाश और धरती में कोई अल्लाह के सिवा ग़ैब (परोक्ष) की बात नहीं जानता, और वे नहीं जानते कि कब फिर जीवित किए जाएँगे''। [सूरा अल-नम्ल: 65]

प्रश्न 14: ईमान के कितने स्तंभ (अरकान) हैं?

उत्तर- 1-अल्लाह तआला पर ईमान
2- उसके फ़रिश्तों पर ईमान
3- उसकी पुस्तकों पर ईमान
4- उसके रसूलों पर ईमान
5- आख़िरत के दिन पर ईमान
6- अच्छी एवं बुरी तक़दीर (भाग्य) पर ईमान
तथा इसकी दलील, मुसलमानों के बीच हदीस़-ए-जिब्रील के नाम से प्रसिद्ध हदीस़ हैः जिब्रील अलैहिस्सलाम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा: मुझे ईमान के बारे में बताइए, तो आपने कहा: ईमान यह है कि तुम अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों, अंतिम दिन तथा भाग्य के अच्छे एवं बुरे होने पर ईमान लाओ''l

प्रश्न 15: ईमान के स्तंभों की व्याख्या करें?

उत्तर: अल्लाह तआला पर ईमान:
इस बात पर ईमान कि अल्लाह ही ने आपको पैदा किया है, वही आपको खाना देता है, केवल वही सभी सृष्टियों का मालिक एवं प्रबंध करने वाला है।
वही माबूद (पूज्य) है, उसके सिवा कोई सत्य माबूद नहीं है।
वह बड़ा, महान एवं सम्पूर्ण है, उसी के लिए सारी प्रशंसा है, उसके अच्छे अच्छे नाम एवं उच्च गुण हैं, उसके बराबर कोई नहीं और न उस पवित्र के जैसा कोई है।
फ़रिश्तों पर ईमान:

वह एक सृष्टि है जिसको अल्लाह ने नूर से, अपनी इबादत एवं अपने आदेश का पूर्ण अनुसरण करने के लिए पैदा किया है।
उन्हीं में से जिब्रील अलैहिस्सलाम हैं, जो नबियों के पास वह्यी (संदेश) लेकर आते थे।
पवित्र ग्रंथों पर ईमान।
ये वो ग्रंथ हैं जिनको अल्लाह ने अपने रसूलों पर उतारा है,
जैसे कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क़ुरआन,
ईसा अलैहिस्सलाम पर इंजील
मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरात,
दावूद अलैहिस्सलाम पर ज़बूर
और इब्राहीम एवं मूसा अलैहिमास्सलाम पर स़हीफ़े।
संदेष्टाओं (रसूलों) पर ईमान:
ये वो लोग हैं जिन्हें अल्लाह ने अपने बन्दों के पास भेजा, ताकि उन्हें उनका धर्म सिखाएं, उन्हें भलाई एवं जन्नत का शुभसंदेश दें और उन्हें बुराई तथा नरक से सचेत करें।
उनमें से सबसे श्रेष्ठ उलुल अज़्म (दृढ़ता वाले रुसुल) हैं, जोकि ये हैं:
नूह अलैहिस्सलाम,
इब्राहीम अलैहिस्सलाम,
मूसा अलैहिस्सलाम,
ईसा अलैहिस्सलाम,
और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम।
अंतिम दिन (आख़िरत के दिन) पर ईमान:
इसका अर्थ है, ईमान रखनाः मृत्यु के बाद क़ब्र की स्थिति पर, क़यामत के दिन पर, तथा उठाए जाने (पुनरुत्थान) और हिसाब के दिन पर, जब स्वर्ग वाले अपने ठिकाने में स्थिर हो जाएंगे एवं नरक वाले अपने ठिकाने में।
तक़दीर की अच्छाई और बुराई पर ईमान:

तक़दीर या भाग्य: यह विश्वास रखना है कि ब्रह्मांड में जो कुछ होता है, अल्लाह सब को जानता है, उसने उसे संरक्षित किताब में लिख लिया है, फिर उसने उसके अस्तित्व एवं पैदा करने को चाहा है।
अल्लाह तआला ने कहा है:
(إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقۡنَـٰهُ بِقَدَر) ''हमने हर चीज़ को ख़ास अनुपात के साथ पैदा किया है''। [सूरा अल-क़मर: 49]
इसके चार दर्जे (श्रेणियां) हैं:
पहला दर्जा: अल्लाह का जान लेना, इसी में से है कि उसका ज्ञान हर चीज़ से पहले है, चीज़ों के घटित होने से पहले भी और घटित होने के बाद भी।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: (إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ) ''निःसंदेह, अल्लाह ही के पास है प्रलय का ज्ञान, वही उतारता है वर्षा और जानता है जो कुछ गर्भाशयों में है, और नहीं जानता कोई प्राणी कि वह कल क्या कमायेगा, और नहीं जानता कोई प्राणी कि किस धरती में मरेगा। वास्तव में, अल्लाह ही सब कुछ जानने वाला, सबसे सूचित है''। [सूरा लुक़मान: 34]
दूसरा दर्जा: अल्लाह ने उसे संरक्षित पुस्तक (लौह़ -ए- मह़फूज़) में लिख लिया है, हर चीज़ जो घटित हुई या होगी, सब कुछ उसके पास पुस्तक में लिखी हुई है।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: (وَعِنْدَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِنْ وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُبِينٍ) "और उसी (अल्लाह) के पास गैब की कुंजियाँ हैं, जिनको सिर्फ वही जानता है, और जो थल और जल में है, उन सभी को वह जानता है, और जो भी पत्ता गिरता है उसे भी वह जानता है, और जमीन के अंधेरों में जो भी दाना है और जो भी तर (आर्द्र) तथा ख़ुश्क (सूखा) है, सब कुछ एक खुली किताब में है"। [सूरा अल-अन्आम: 59]
तीसरा दर्जा: हर चीज़ अल्लाह की चाहत से ही होती है, कोई भी चीज़ नहीं होती है, या कुछ पैदा नहीं होता है, मगर जब वह चाहता है।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: (لِمَنْ شَاءَ مِنْكُمْ أَنْ يَسْتَقِيمَ 28 وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ 29) “(विशेष रूप से) उसके लिए जो तुम में से सीधे मार्ग पर चलना चाहे। तथा तुम बिना समस्त जगत के रब के चाहे, कुछ नहीं चाह सकते”। [सूरा अत-तकवीर: 28, 29]
चौथा दर्जा: इस बात पर ईमान कि समस्त सृष्टि अल्लाह द्वारा बनाई गई है, उसी ने उनके व्यक्तित्व, उनके गुण, उनकी चाल और उनमें सब कुछ पैदा किया है।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: (وَاللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ) “हालाँकि अल्लाह ने तुम को और जो तुम करते हो, सबको पैदा किया है”। [सूरा अस-साफ़्फ़ात: 96]

प्रश्न 16: क़ुरआन की क्या परिभाषा है?

उत्तर- वह अल्लाह तआला का कलाम है, उसकी मख़लूक़ (सृष्टि) नहीं है।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (وَإِنْ أَحَدٌ مِنَ الْمُشْرِكِينَ اسْتَجَارَكَ فَأَجِرْهُ حَتَّى يَسْمَعَ كَلَامَ اللَّهِ) "और यदि मुश्रिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो उसे शरण दो, यहाँ तक कि अल्लाह की बातें सुन ले"। [सूरा अल-तौबा: 6]

प्रश्न 17: सुन्नत क्या है?

उत्तर- यह पैगंबर -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की हर बात, कार्य, या आपकी सहमति, या नैतिक विशेषता, अथवा शारीरिक विशेषता है।

प्रश्न 18: बिद्अत (विधर्म) क्या है? और क्या हम उसे स्वीकार करें?

उत्तर- हर वह नई चीज़ जिसे लोगों ने धर्म में गढ़ लिया हो, और वो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या आपके साथियों के ज़माना में नहीं थी।
हम उसे कदापि स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि उसका खंडन करेंगे।
क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
हर बिदअत गुमराही है''। इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है।
इसका उदाहरण: इबादत में ज़्यादा करना, जैसे कि वुज़ू में वृद्धि करते हुए अंगों को चार बार धोना, इसी प्रकार से नबी का जन्म दिन मनाना,क्योंकि ये नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम या आपके साथियों से वर्णित नहीं हैं।

प्रश्न 19: वलाअ एवं बराअ अर्थात दोस्ती एवं दुश्मनी का अक़ीदा क्या है?

उत्तर- वलाअ अर्थात दोस्ती, यह मोमिनों से मुहब्बत एवं उनकी मदद करने का नाम है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ) "और मोमिन मर्द और मोमिन औरतें एक-दूसरे के दोस्त हैं"। [सूरा अल-तौबा: 71]
अलबराअ या अलग हो जाना, यह काफ़िरों से नफ़रत एवं उनसे दुश्मनी का नाम है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ فِي إِبْرَاهِيمَ وَالَّذِينَ مَعَهُ إِذْ قَالُوا لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَآءُ مِنْكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ الْعَدَاوَةُ وَالْبَغْضَاءُ أَبَدًا حَتَّى تُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَحْدَهُ) ''इब्राहीम और उनके साथियों में तुम्हारे लिए अच्छा नमूना है, जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा था कि हम तुम्हें और हर उस वस्तु को त्याग दे रहे हैं जिनकी तुम लोग अल्लाह के अलावा पूजा करते हो। हमने तुम्हारा खुला इंकार किया और आज से हमारे और तुम्हारे बीच सदा के लिए दुश्मनी और घृणा शुरू हो रही है, यहाँ तक कि तुम लोग केवल एक अल्लाह पर ईमान ले आओ''। [सूरा अल-मुमतहिनह: 4]

प्रश्न 20: क्या अल्लाह धर्म के रूप में इस्लाम के सिवा किसी और धर्म को स्वीकार करेगा?

उत्तर- अल्लाह इस्लाम के सिवा किसी और धर्म को स्वीकार नहीं करेगा।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (وَمَن یَبتَغِ غَیرَ ٱلإِسلَـٰمِ دِینا فَلَن یُقبَلَ مِنهُ وَهُوَ فِی ٱلـَٔاخِرَةِ مِنَ ٱلخَـٰسِرِینَ) ''जो इस्लाम के अतिरिक्त किसी और धर्म को चाहेगा, अल्लाह उससे उसको स्वीकार नहीं करेगा, और वह आख़िरत में घाटा उठाने वालों में से होगा''। [सूरा आले-इमरान: 85]

प्रश्न 21: कुफ़्र ज़ुबान से, काम से एवं आस्था (एतक़ाद) से होता है, इसका उदाहरण क्या है?

उत्तर- ज़ुबान का उदाहरण: पाक अल्लाह या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को गाली देना।
कार्य का उदाहरण: क़ुरआन का अपमान करना या अल्लाह के सिवा अन्य को सज्दा करना।
आस्था में कुफ़्र का उदाहरण: यह विश्वास रखना कि अल्लाह के अतिरिक्त भी किसी की इबादत की जा सकती है या अल्लाह के साथ कोई और भी सृष्टिकर्ता है।

प्रश्न 22: निफ़ाक़ (पाखंड) क्या है, और उसके कितने प्रकार हैं?

उत्तर-
1- बड़ा निफ़ाक़: और वह है कुफ़्र को छुपाना एवं ईमान का दिखावा करना।
यह इस्लाम से बाहर निकाल देता है, और यह महा कुफ़्र है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (إِنَّ ٱلمُنَـٰفِقِینَ فِی ٱلدَّركِ ٱلأَسفَلِ مِنَ ٱلنَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُم نَصِیرًا) ''मुनाफ़िक़ीन (पाखंडी लोग) जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे, और आप उनके लिए कोई मदद करने वाला नहीं पाएंगे''। [सूरा अल-निसा: 145]
2- छोटा निफ़ाक़:
उदाहरण: झूठ बोलना, वचन पूरा न करना एवं अमानत में ख़्यानत (बेईमानी) करना।
यह इस्लाम से बाहर नहीं करता है, यह ऐसे गुनाहों में से है जिनका करने वाला यातना का हक़दार है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है:
मुनाफ़िक़ की तीन निशानियाँ हैं: जब बोलता है तो झूठ बोलता है, वादा करता है तो उसे पूरा नहीं करता और जब उसके पास अमानत रखी जाती है तो उसमें दगा करता है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 23: अंतिम नबी एवं रसूल कौन हैं?

उत्तर- मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَد مِّن رِّجَالِكُم وَلَـٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَۗ) ''मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं, बल्कि अल्लाह के रसूल और अंतिम नबी हैं''। [सूरा अल-अहज़ाब: 40] अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: मैं नबियों की श्रृंखला को समाप्त करने वाला हूँ, मेरे बाद कोई नबी नहीं होगा''। इस हदीस़ को अबू दावूद और तिरमिज़ी आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 24: मुअ्जज़ा (चमत्कार) क्या है?

उत्तर- अल्लाह तआला अपने नबियों को उनकी सच्चाई को इंगित करने के लिए असाधारण आदतों में से जो देता है, उसे मुअ्जज़ा अर्थात चमत्कार कहते हैं। जैसे कि:
-नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए चाँद का दो टुकड़े हो जाना।
-मूसा अलैहिस्सलाम के लिए समुद्र का फट जाना, एवं फ़िरऔन तथा उसके लशकर का डूब जाना।

प्रश्न 25: स़हाबा कौन हैं? तथा क्या हम उनसे प्रेम रखें?

उत्तर- स़हाबी वह है जिसने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ईमान की हालत में मुलाक़ात की हो एवं इस्लाम पर ही उनकी मृत्यु हुई हो।
हम उनसे मुहब्बत करते हैं, उनके रास्ते पर चलते हैं, वे नबियों के बाद लोगों में सबसे अच्छे एवं भले इंसान हैं।
उनमें सबसे उत्तम चारों ख़लीफ़ा हैं:

अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु,
उमर रज़ियल्लाहु अन्हु,
उस़्मान रज़ियल्लाहु अन्हु,
और अली रज़ियल्लाहु अन्हु।

प्रश्न 26: मोमिनों की माँएं कौन हैं?

उत्तर- वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियाँ हैं।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (ٱلنَّبِيُّ أَوۡلَى بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ مِنۡ أَنفُسِهِمۡۖ وَأَزۡوَجُهُۥٓ أُمَّهَتُهُمۡۗ) ''नबी ईमान वालों से उनके प्राणों से भी अधिक निकट (प्रिय) हैं, एवं उनकी पत्नियाँ उनकी मातायें हैं''। [सूरा अल-अहज़ाब: 6]

प्रश्न 27: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के घर वालों का हम पर क्या अधिकार है?

उत्तर- हम उनसे मुहब्बत रखते हैं, उनका सम्मान करते हैं, उनसे जो नफ़रत करे, हम उनसे नफ़रत करते हैं, हम उनके संबंध में अतिशयोक्ति से काम नहीं लेते, और आले बैत में शामिल हैं आपकी पत्नियाँ, आपकी औलाद एवं बनू हाशिम तथा बनू मुतल्लिब ख़ानदान के मोमिनीन।

प्रश्न 28: मुस्लिम शासकों के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है?

उत्तर- हमारा कर्तव्य है, उनका सम्मान करना, गुनाह के कामों के अलावा में उनके आदेशों को सुनना एवं पालन करना, उनके विरुद्ध विद्रोह न करना, उनके लिए दुआ करना एवं अकेले में उनको भलाई की राह दिखाना।

प्रश्न 29: मोमिनों का घर क्या है?

उत्तर- जन्नत, अल्लाह तआला ने कहा है: (إِنَّ اللَّهَ يُدْخِلُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ) ''निश्चय अल्लाह उन्हें प्रवेश देगा, जो ईमान लाये तथा सत्कर्म किये, ऐसे स्वर्गों में, जिनमें नहरें प्रवाहित हैं। [सूरा मुहम्मद: 12]

प्रश्न 30: काफ़िरों का घर क्या है?

उत्तर- जहन्नम, अल्लाह तआला ने कहा है: (فَاتَّقُوا النَّارَ الَّتِي وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ أُعِدَّتْ لِلْكَافِرِينَ) ''उस आग से डरो जिसका ईंधन इंसान एवं पत्थर होंगे, और वह काफ़िरों के लिए तैयार की गई है''। [सूरा अल-बक़रा: 24]

प्रश्न 31: ख़ौफ़ (डर) क्या है? रजाअ (उम्मीद) क्या है? और उसकी दलील क्या है?

उत्तर- अल्लाह और उसके दंड से भय खाने को डर या ख़ौफ़ कहते हैं।
रजाअ या उम्मीद, अल्लाह के स़वाब (प्रतिफल), एवं उसकी क्षमा या रहमत की उम्मीद को रजाअ कहते हैं।
इसका प्रमाण:
उच्च एवं महान अल्लाह का यह फ़रमान है: वास्तव में, जिन्हें ये लोग पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार के निकट होने का साधन खोजते रहते हैं, कि उन में से कौन अधिक निकट हो जाए? और उसकी दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। वास्तव में, आपके रब की यातना डरने योग्य है''। [सूरा अल-इस्रा: 57] और दूसरी जगह अल्लाह तआला ने फ़रमायाः (نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ 49 وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ 50) ''(हे नबी) आप मेरे बन्दों को ख़बर दे दें कि वास्तव में मैं बड़ा क्षमाशील एवं दयावान हूँ। एवं मेरी यातना बहुत दर्दनाक यातना है''। [सूरा अल-हिज्र: 49,50]

प्रश्न 32: अल्लाह के कुछ नाम एवं विशेषण बताएं?

उत्तर- अल्लाह, रब, रहमान, समीअ, बस़ीर, अलीम, रज़्ज़ाक़, हय्इ एवं अज़ीम, इनके अलावा भी अल्लाह के सुन्दर नाम एवं उच्च विशेषताएँ हैं।

प्रश्न 33: इन नामों की व्याख्या कीजिए?

उत्तर- अल्लाह: इसका अर्थ है एक सत्य माबूद, पूज्य, जो केवल एक है, जिसका कोई साझी नहीं।
रब:
अर्थात, एकमात्र पैदा करने वाला, मालिक, जीविका देने वाला, प्रबंध करने वाला।
समीअ:
जिसके सुनने की शक्ति हर चीज़ को शामिल है, वह सभी आवाज़ों को उनके अलग अलग होने एवं विविधता के बावजूद सुनता है।
बस़ीर:
जो हर छोटी बड़ी चीज़ों को देखता एवं उनका ज्ञान रखता है।
अलीम: जिसका ज्ञान व्यापक है, जो हर चीज़ के भूत, वर्तमान और भविष्य को शामिल है।
रहमान:
जिसकी रहमत प्रत्येक सृष्टि एवं जीवित चीज़ को शामिल है, सभी बन्दे एवं सृष्टियाँ उसकी दया व कृपा की छाया में जी रही हैं।
रज़्ज़ाक़:
जिसपर सभी सृष्टियों जैसे कि इंसान, जिन्न एवं धरती पर चलने वाली सभी चीज़ो को खिलाने की ज़िम्मेदारी है।
हय्य:
जो अमर है, कभी नहीं मरेगा, जबकि सभी सृष्टियाँ मर जाएंगी।
अज़ीम:
जिसके नामों, कामों एवं विशेषताओं में हर प्रकार की महानता, पूर्णता एवं बड़ाई है।

प्रश्न 34: मुस्लिम उलमा (विद्वानों) के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है?

उत्तर- हम उनसे मुहब्बत करते हैं, धार्मिक समस्याओं एवं आपदाओं के समय उनका रुख करते हैं, उनका गुणगान करते हैं, जो उनकी बुराई बयान करता है, वह सही रास्ते पर नहीं है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (يَرۡفَعِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا مِنكُمۡ وَٱلَّذِينَ أُوتُوا ٱلۡعِلۡمَ دَرَجَـٰتۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعۡمَلُونَ خَبِير ) ''अल्लाह तुम लोगों में से ईमान वालों एवं ज्ञान वालों के दर्जे को ऊँचा करता है, और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उनको अच्छी तरह जानता है''। [सूरा अल-मुजादला: 11]

प्रश्न 35: कौन लोग अल्लाह के वली (मित्र, दोस्त) हैं?

उत्तर- वो ईमान वाले एवं अल्लाह से डरने वाले हैं।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ 62 الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ 63) ''सुनो! बेशक अल्लाह के मित्रों को कोई भय नहीं है और न वे उदासीन होंगे। जो लोग ईमान लाए एवं अल्लाह से डरते हैं 63''। [सूरा यूनुस: 62,63]

प्रश्न 36: क्या ईमान (केवल) ज़ुबान से कहने एवं कर्म करने का नाम है?

उत्तर- ईमान कहने, कर्म करने एवं दिल से आस्था रखने का नाम है।

प्रश्न 37: क्या ईमान घटता एवं बढ़ता है?

उत्तर- अल्लाह के अनुपालन से ईमान बढ़ता है एवं अल्लाह की अवज्ञा से घटता है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَإِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ آيَاتُهُ زَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ) "वास्तव में, ईमान वाले वही हैं कि जब अल्लाह का वर्णन किया जाए, तो उनके दिल काँप उठते हैं और जब उनके समक्ष उसकी आयतें पढ़ी जाएँ, तो उनका ईमान अधिक हो जाता है और वे अपने पालनहार पर ही भरोसा रखते हैं"। [सूरा अल-अनफाल: 2]

प्रश्न 38: (इबादत में) एहसान क्या है?

उत्तर- ''आप अल्लाह की उपासना इस तरह करें कि जैसे आप उसे सनयन देख रहे हैं। यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि आप उसे देख रहे हैं, तो (यह कल्पना करें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है''l

प्रश्न 39: सर्वोच्च अल्लाह के निकट नेक कार्य कब स्वीकार्य होते हैं?

उत्तर- दो शर्तों के साथ:
1- जब यह विशुद्ध रूप से सर्वशक्तिमान अल्लाह की प्रसन्नता के लिए हो।
2- जब यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़ा पर हो।

प्रश्न 40: अल्लाह तआला पर तवक्कुल अर्थात भरोसा करने का क्या मतलब है?

उत्तर- साधनों को अपनाते हुए, लाभ कमाने एवं नुकसान को दूर रखने के लिए अल्लाह पर भरोसा करना, इसी का नाम तवक्कुल (भरोसा) है।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ) "तथा जो अल्लाह पर निर्भर रहेगा, तो वह उसके लिए काफ़ी होगा"। [सूरा अल-तलाक़: 3]
आयत में उल्लेखित (حَسْبُهُ) का अर्थ है कि वह काफ़ी है।

प्रश्न 41: ''अम्र बिल मअरूफ़ व अन् नह़्यु अनिल मुन्कर (अच्छाई की आज्ञा देना और बुराई से मना करना)'' का क्या मतलब है?

उत्तर- मअरूफ़ अर्थात अच्छाई का मतलब है (लोगों को) महान अल्लाह के हर अज्ञापालन का आदेश देना एवं मुन्कर अर्थात बुराई का मतलब है (लोगों को) महान अल्लाह की हर अवज्ञा से रोकना।
सर्वोच्च अल्लाह का कथन हैः (كُنتُمۡ خَيۡرَ أُمَّةٍ أُخۡرِجَتۡ لِلنَّاسِ تَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَتَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَتُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِۗ) ''तुम उत्तम क़ौम हो, जो लोगों के लिए आए हो, तुम भलाई का आदेश देते हो एवं बुराई से रोकते हो, तथा अल्लाह पर ईमान रखते हो''। [सूरा आले-इमरान: 110]

प्रश्न 42: अह्ले सुन्नत व अल-जमाअत कौन लोग हैं?

उत्तर- जो लोग अपनी कथनी, करनी एवं अक़ीदा (आस्था) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तथा उनके साथियों के मार्ग पर हों।
उन लोगों को अह्ले सुन्नत इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वे लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सन्नत की पैरवी करते हैं एवं बिद्अत को त्याग देते हैं।
एवं जमाअत इसलिए कहा जाता है कि वे सत्य पर एकत्र हुए हैं एवं उसमें अलग-अलग नहीं होते।

फ़िक़्ह खंड47

प्रश्न 1: तहारत (पवित्रता) को परिभाषित करें?

उत्तर- तहारत: नापाकी (अपवित्रता) को ख़त्म करने एवं गंदगी को दूर करने को कहते हैं।
गंदगी से पाकी: इसका अर्थ है मुसलमान अपने शरीर, कपड़े, जगह या नमाज़ पढ़ने के स्थान में पड़ी गंदगियों को दूर करे।
नापाकी से पाकी:
यह होता है पाक पानी के द्वारा वुज़ू या स्नान करके, या यह प्राप्त होता है तयम्मुम के द्वारा उसके लिए जिसके पास पानी न हो या जो पानी का सेवन करने में असमर्थ हो।

प्रश्न 2: गंदगी लग जाने से कैसे पाक हुआ जा सकता है?

उत्तर- उसके पाक होने तक पानी से धोया जाए,
और यदि कुत्ता मुँह डाल दे तो सात बार धोया जाए, पहली बार मिट्टी से।

प्रश्न 3: वुज़ू करने की क्या फ़ज़ीलत (महत्व) है?

उत्तर- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया है: "जब मुस्लिम या मोमिन बंदा वुज़ू करता है और अपना चेहरा धोता है, तो उसके चेहरे से वह सारे गुनाह पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ निकल जाते हैं, जो उसने अपनी आँखों से देखकर किया था। फिर जब वह अपने हाथों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके हाथ के वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जो उसके हाथों के पकड़ने से हुए थे। फिर जब वह अपने पैरों को धोता है, तो पानी के साथ या पानी की अंतिम बूँद के साथ उसके पैरों से वह सारे गुनाह निकल जाते हैं, जिनकी ओर उसके पाँव चलकर गए थे। यहाँ तक कि वह गुनाहों से पवित्र होकर निकलता है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 4: वुज़ू का नियम क्या है?

उत्तर- दोनों हथेलियों को तीन बार धोया जाए,
तीन बार कुल्ला किया जाए एवं नाक में पानी लेकर उसको झाड़ा जाए,
कुल्ला करने का नियम यह है कि मुँह में पानी लेकर, उसे हिलाया जाए, फिर उसे फेंक दिया जाए,
इस्तिंशाक़ अर्थात नाक में पानी लेने का नियम यह है कि दायां हाथ से पानी को हवा के द्वारा नाक के अंदर लिया जाए,
तथा इस्तिंस़ार अर्थात नाक झाड़ने का नियम यह है कि पानी को नाक से बायां हाथ के द्वारा झाड़ कर फेंक दिया जाए।
पूरे चेहरे को तीन बार धोया जाए।
फिर दोनों हाथों को कोहनियों समेत तीन बार धोना है।
फिर सर का मसह करना है, और वह इस तरह कि अपने दोनों हाथों को सर के अगले हिस्से से पिछले हिस्से तक ले जाएं एवं फिर उसी प्रकार से लौटाएं, और दोनों कानों का मसह करें।
फिर दोनों पैरों को टखना समेत तीन बार धोएं।
यह वुज़ू का मुकम्मल तरीक़ा है, यही बुख़ारी एवं मुस्लिम की हदीस़ों में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित है, जिन्हें उस़मान एवं अब्दुल्लाह बिन ज़ैद (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) आदि ने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है। बुख़ारी आदि में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह भी साबित है कि; "आपने एक-एक बार वुज़ू किया, और दो-दो बार", अर्थात आपने वुज़ू के सभी अंगों को एक-एक बार या दो-दो बार धोया।

प्रश्न 5: वुज़ू में कितनी चीज़ें अनिवार्य हैं, उनकी संख्या क्या है?

उत्तर- यह वो चीज़ें हैं जिनके बिना वुज़ू सही नहीं होता है, यदि उनमें से एक भी छोड़ा जाए:
1- चेहरा का धोना, इसी के अन्तर्गत कुल्ली करना और नाक में पानी चढाना है|
2- फिर दोनों हाथों को कुहनियों समेत धोना है।
3- सर का मसह करना, और उसी में कान का मसह भी शामिल है।
4- टखने समेत पैर धोना।
5- क्रमानुसार अंगों को धोना, जैसे चेहरा धोया जाए, फिर दोनों हाथ, फिर सर का मसह और अंतिम में पैर धोये जाएं।
6- निरंतरता: अर्थात एक साथ ही वुज़ू पूर्ण किया जाए, अंगों को धोने के बीच इतना अंतराल न हो कि पहले धोए हुए अंग सूख जाएं।
जैसे आधा वुज़ू कर के छोड़ दिया जाए एवं शेष आधे को दूसरे समय किया जाए, तो इस प्रकार वुज़ू सही नहीं होता है।

प्रश्न 6: वुज़ू में कितनी चीज़ें सुन्नत हैं, उनकी संख्या क्या है?

उत्तर- वुज़ू की सुन्नत का मतलब यह है कि यदि उसको किया जाए तो अधिक नेकी एवं प्रतिफल है, और यदि छोड़ दिया जाए तो कोई गुनाह नहीं है, वुज़ू सही हो जाएगा।
1- तस्मिया अर्थात बिस्मिल्लाह कहना,
2- दातून करना,
3- दोनों हथेलियों को धोना,
4- उंगलियों के बीच खिलाल करना,
5- अंगों को दो या तीन बार धोना,
6- दाएं से शुरू करना,
7- वुज़ू के बाद दुआ पढ़नाः "أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لا شَرِيكَ لَهُ، وأشهدُ أنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ" अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़्दहू ला शरीक् लहू, व अश्हदु अन्ना मुह़म्मदन अब्दुहु व रसूलुहू (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, तथा गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे और रसूल हैं।)
8- और वुज़ू के बाद दो रक्अत नमाज़ पढ़ना।

प्रश्न 7: वुज़ू को ख़त्म (भंग) कर देने वाली चीज़े कितनी हैं?

उत्तर- आगे या पीछे (मल मूत्र) के रास्ते से जो भी निकले, जैसे मूत्र, मल, या हवा (अधोवायु, पाद)।
नींद, या पागलपन या बेहोश हो जाना,
ऊँट का मांस खाना
और बिना किसी आड़ के लिंग या गुदा को हाथ से छूना।

प्रश्न 8: तयम्मुम क्या है?

उत्तर- पानी न होने या प्रयोग करने में असमर्थ होने की स्थिति में पाक मिट्टी इस्तेमाल करने को तयम्मुम कहते हैं।

प्रश्न 9: तयम्मुम कैसे किया जाए?

उत्तर- अपनी दोनों हथेलियों के भीतर वाले हिस्से को एक बार मिट्टी पर मारना, फिर उससे एक बार चेहरा एवं दोनों हथेलियों के बाहरी हिस्से का मसह करना।

प्रश्न 10: तयम्मुम को निरस्त करने वाली चीज़ें क्या हैं?

उत्तर- वुज़ू को निरस्त करने वाली प्रत्येक चीज़ तयम्मुम को भी निरस्त कर देती है।
इसके अतिरिक्त जब पानी मिल जाए तो तयम्मुम ख़त्म हो जाता है।

प्रश्न 11: ख़ुफ़्फ़ एवं जौरब क्या हैं? और क्या उनपर मसह किया जा सकता है?

उत्तर- ख़ुफ़्फ़ वह है जो पैर में पहना जाता है, एवं चमड़े का होता है,
जबकि जौरब वह है जो पैर में पहना जाता है, एवं चमड़े के अलावा का होता है।
पैर को धोने के बदले इन दोनों पर मसह करना मश्रूअ (जायज़) है।

प्रश्न 12: ख़ुफ़्फ़ पर मसह करने की हिक्मत (तत्वदर्शिता) क्या है?

उत्तर- बन्दे पर आसानी करना, विशेषकर शीत ऋतु, जाड़े एवं सफ़र के समय में, जब पैर के पहनावे को उतारना मुश्किल होता है।

प्रश्न 13: दोनों ख़ुफ़्फ़ पर मसह करने के सही होने के लिए क्या शर्तें हैं?

उत्तर- पहली शर्त यह है कि दोनों मोज़े को पवित्र अवस्था में पहना जाए, अर्थात वुज़ू के बाद।
2- दूसरी शर्त यह है कि मोज़ा पाक हो, नापाक पर मसह करना सही नहीं है।
3- तीसरी शर्त यह है कि वुज़ू में जितनी जगह को धोना ज़रूरी होता है, उतनी जगह को मोज़ा ढ़ांपे रखे।
4- निर्धारित समय तक ही मसह किया जाए, जैसा कि (घर पर) ठहरे रहने वाले के लिए एक दिन एवं एक रात, तथा मुसाफिर के लिए तीन दिन एवं तीन रातें।

प्रश्न 14: दोनों ख़ुफ़्फ़ पर मसह करने की क्या सूरत है?

उत्तर- वह इस तरह से किया जाए कि अपने दोनों हाथों की पानी से तर उंगलियों को अपने दोनों पैरों पर रखे, फिर पिंडलियों तक उसे फेरे, दायां हाथ से दायां पैर का मसह करे एवं बायां हाथ से बायां पैर का मसह, और अपनी उंगलियों को खुली रखे, तथा इसे न दोहराए।

प्रश्न 15: किस चीज़ से मसह ख़त्म हो जाता है?

उत्तर- 1- मसह की अवधि का ख़त्म हो जाना, शरई तौर पर मसह की निर्धारित अवधि के समाप्त हो जाने के बाद मोज़े पर मसह करना सही नहीं है, ठहरे व्यक्ति के लिए एक दिन एवं एक रात, तथा मुसाफिर के लिए तीन दिन एवं तीन रातें।
2- मोज़े का उतार देना, यदि इंसान दोनों मोज़ों में से किसी एक को भी उतार दे तो उनपर मसह नहीं किया जा सकता है।

उत्तर 16: स़लात का क्या अर्थ है?

उत्तर- स़लात: (नमाज़) यह विशिष्ट शब्दों और कार्यों के द्वारा अल्लाह की इबादत करने को कहते हैं, जिसे अल्लाहु अकबर के साथ आरंभ किया जाता है, एवं सलाम से जिसका अंत होता है।

प्रश्न 17: स़लात (नमाज़) का क्या हुक्म है?

हर मुसलमान पर नमाज़ अनिवार्य है।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (إِنَّ الصَّلَاةَ كَانَتْ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ كِتَابًا مَوْقُوتًا) "अवश्य नमाज़ मोमिनों पर निश्चित तथा निर्धारित समय पर अनिवार्य की गई है"। [सूरा अल-निसा: 103]

प्रश्न 18: नमाज़ छोड़ने का क्या हुक्म है?

उत्तर- नमाज़ छोड़ना कुफ़्र है, नबी -उनपर अल्लाह की दया एवं शांति हो- ने फ़रमाया:
"हमारे और उन (काफिरों) के बीच अंतर केवल नमाज़ का है, इसलिए जिस व्यक्ति ने उसे छोड़ दिया उसने कुफ्र किया''।
इस हदीस को इमाम अहमद और तिरमिज़ी आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 19: मुसलमान पर दिन एवं रात में कितनी नमाज़ें फ़र्ज़ हैं? एवं हर नमाज़ की रक्अतों की संख्या क्या है?

उत्तर- दिन व रात में पांच नमाज़ें फ़र्ज़ हैं, फ़ज्र की नमाज़: दो रक्अत, ज़ुह्र की नमाज़: चार रक्अत, अस्र की नमाज़: चार रक्अत, मग़्रिब की नमाज़: तीन रक्अत एवं इशा की नमाज़: चार रक्अत।

प्रश्न 20: नमाज़ की कितनी शर्तें हैं?

उत्तर- 1- इस्लाम, काफ़िर की नमाज़ सही नहीं।
2- अक़्ल, पागल की नमाज़ सही नहीं होती।
3- बुद्धि, छोट बच्चा जिसे अच्छे बुरे की तमीज़ नहीं, उसकी नमाज़ नहीं होती है।
4- निय्यत (इरादा)।
5- समय का होना।
6- नापाकी से पाक होना
7- गंदगी से पाक होना
8- नग्नता को ढकना
9- क़िबला की ओर मुँह करना

प्रश्न 21: नमाज़ के कितने स्तंभ (अरकान) हैं?

उत्तर- नमाज़ के चौदह स्तंभ हैं, और वह इस प्रकार हैं:
पहला: क्षमता रखने वाले पर फ़र्ज़ नमाज़ में खड़ा होना,
तकबीर-ए-तहरीमा, और यह ''अल्लाहु अकबर'' कहना है,
सूरा फ़ातिहा पढ़ना,
रुकुअ, (जिसमें) अपनी पीठ को सपाट रखे और अपना सिर आगे की ओर रखे,
रुकूअ से सिर उठाना,
सीधा खड़ा होना,
सज्दा, तथा सज्दा की जगह में अपनी पेशानी, नाक, दोनों हथेलियों, घुटनों, और दोनों पैर की उंगलियों के किनारों को टिकाए।
सज्दे से सिर उठाना,
दोनों सज्दों के बीच बैठना,
सुन्नत यह है किः बायां पैर को बिछाए एवं दायां पैर को खड़ा रखे, तथा उसे क़िबला रुख रखे।
शांति, और यह नमाज़ के हर काम में सुकून का होना है।
अंतिम तशह्हुद,
उसके लिए बैठना,
और दोनों सलाम, और वह यह है कि दो बार ''अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह'' कहा जाए।
स्तंभों के क्रम का ख़्याल -जैसा कि मैं ने उल्लेख किया-, यदि जान बूझ कर रुकूअ से पहले सज्दा करे, तो नमाज़ बात़िल (व्यर्थ) हो जाएगी, और यदि भूल कर करे तो उसके लिए लौटकर रुकूअ करना, फिर सजदा करना वाजिब है।

प्रश्न 22: नमाज़ की अनिवार्य चीज़ों का उल्लेख करें?

उत्तर- नमाज़ की अनिवार्य चीज़ें आठ हैं, और वह इस प्रकार हैं:
1- तकबीर-ए-तहरीमा के अलावा दूसरी तकबीरें,
2- इमाम और अकेले के लिए ''समिअल्लाहु लिमन हमिदह'' कहना,
3- ''रब्बना व लकल हम्द'' कहना,
4- रुकूअ में (कम से कम) एक बार ''सुब्हान् रब्बी अल-अज़ीम'' कहना,
5- सज्दों में (कम से कम) एक बार ''सुब्हान रब्बी अल-आला'' कहना,
6- दोनों सज्दों के बीच ''रब्बिग़्फ़िर ली'' कहना,
7- पहला तशह्हुद
8- और पहले तशह्हुद के लिए बैठना।

प्रश्न 23: नमाज़ की सुन्नतें क्या हैं?

उत्तर- नमाज़ की ग्यारह सुन्नतें हैं, और वह इस प्रकार हैं:
1- तकबीर-ए-तहरीमा कहने के बाद नमाज़ शुरू करने की दुआ पढ़ेंगे: ''सुब्हानका अल्लाहुम्मा व बि हम्दिका, व तबारकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा ग़ैरुका''।
2- तअव्वुज़ अर्थात ''अऊज़ुबिल्लाहि मीनश् शैतानिर रजीम'' पढ़ेंगे।
3- बस्मला अर्थात ''बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम'' पढ़ेंगे।
4- आमीन कहना,
5- सूरह फ़ातिहा के बाद कोई दूसरा सूरह पढ़ना,
6- इमाम का आवाज़ के साथ क़ुरआन पढ़ना,
तहमीद (अर्थातः रब्बना व लक् अल्ह़मद) के बाद ''मिल्अस् समावाति व मिल्अल अरज़ि, व मिल्अ मा शिअ्त मिन शयइन बादु'' कहना,
8- रुकूअ की तसबीह में (एक बार से अधिक) जितना ज़्यादा पढ़ा जाए, दो बार, तीन बार या उससे अधिक बार,
9- सज्दों की तसबीह में (एक बार से अधिक) जितनी बार अधिक पढ़ा जाए,
10- दोनों सज्दों के बीच ''रब्बिग़्फ़िर ली'' को जितनी अधिक बार पढ़ा जाए,
11- अंतिम तशह्हुद में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तथा उनकी औलाद पर शांति एवं बरकत की दुआ भेजना, फिर उसके बाद दुआ करना।
चौथी बात, अफ़आल अर्थात कार्यों में सुन्नत, जिन्हें हैअत अर्थात कैफीयत कहा जाता है।
1- तकबीर-ए-तहरीमा के साथ दोनों हाथों को उठाना,
2- तथा रुकूअ करते समय,
3- और रुकूअ से उठते समय भी हाथ उठाना,
4- उसके बाद उसे छोड़ देना,
5- दायें हाथ को बायें हाथ पर रखना,
6-अपनी दृष्टि को सज्दे के स्थान पर रखना,
7- ख़ड़े होते हुए दोनों पैरों के बीच दूरी रखना,
8- रुकूअ में अपने दोनों घुटनों को अपनी उंगलियों को फैलाते हुए पकड़ना, पीठ सीधी रखना एवं सिर आगे की ओर रखना,
9- सज्दों में सज्दों के अंगों को ज़मीन पर टिकाना एवं सज्दों की जगह को छूना,
10- अपने दोनों बाज़ू को अपने दोनों पहलू (पसली) से, पेट को रानों से तथा रानों को पिंडलियों से अलग रखना, अपने दोनों घुटनों के बीच दूरी रखना, पैरों को खड़ा रखना, अपनी उंगलियों के अंदरूनी हिस्से को अलग-अलग करते हुए धरती पर बिछाना तथा दोनों हाथों को गर्दन के बराबर फैला कर रखना इस अवस्था में कि दोनों हाथों की उंगलियों सटी हुई हों।
11- दोनों सज्दों के बीच की बैठक एवं पहले तशह्हुद में इफ़तिराश (अपने बायां पैर को चूतड़ के नीचे रखना एवं उसपर बैठना, और दायां पैर को खड़ा रखना) करना एवं दूसरे तशह्हुद में तवर्रुक (अर्थात बायां पैर को दायें पैर के नीचे से आगे निकाल कर ज़मीन पर बैठना, इस हाल में कि दायां पैर खड़ा हो) करना।
12- दोनों सज्दों के बीच एवं तशह्हुद में दोनों हाथों को दोनों रानों के ऊपर फैला कर एवं उंगलियों को मिला करके रखना, परंतु तशह्हुद की स्थिति में कनिष्ठा एवं अनामिका उंगलियों द्वारा मुट्ठी बना लेना,एवं अंगूठा एवं मध्यमा उंगलियों का दायरा बनाना तथा तर्जनी अर्थात गवाही देने वाली उंगली से अल्लाह का ज़िक्रव् करते समय इशारा करना,
13- सलाम फेरते समय दायें एवं बाएं दोनों ओर देखना।

प्रश्न 24: नमाज़ को बात़िल अर्थात ख़त्म कर देने वाली चीज़ें क्या क्या हैं?

उत्तर- 1- नमाज़ के किसी रुक्न (स्तंभ) या शर्तों में से किसी शर्त को छोड़ देना,
2- जान बूझकर बात करना,
3- खाना या पीना,
4- लगातार बहुत अधिक हरकत करना,
5- और नमाज़ के वाजिबात (अनिवार्य कार्यों) में से किसी वाजिब को जान-बुझ कर छोड़ देना।

प्रश्न 25: मुसलमान कैसे नमाज़ पढ़े?

उत्तर- नमाज़ पढ़ने का नियम:
1- अपने पूरे शरीर के साथ सीधी तरह क़िबला रुख हो, बिना किसी विचलन या मोड़ के।
2- फिर ज़बान से कहे बिना उस नमाज़ की दिल में निय्यत करना जो नमाज़ वह पढ़ना चाहता है।
3- फिर तकबीर-ए-तहरीमा अर्थात ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधों तक उठाना।
4- फिर अपनी छाती के ऊपर अपने दाहिने हाथ की हथेली को अपने बाएं हाथ की हथेली के ऊपर रखे।
5- फिर नमाज़ शुरू करने की दुआ पढ़े, और कहे: अल्लाहुम्मा बाइद बैनी व बैना खतायाया कमा बाअत्ता बैनलमशरिक़ि वलमग़रिबि,अल्लाहुम्मा नक़्क़िनी मिन खतायाया कमा युनक़्क़स् स़ौबुल अब्यज़ु मिनद्दनसि,अल्लाहुम्मग्सिलनी मिन खतायाया बिलमाइ वस्सल्जि वल्बरद्" (हे अल्लाह! मेरे और मेरे पापों के मध्य वैसी दूरी करदे,जैसी तूने पूर्व और पश्चिम के बीच दूरी कर दी है, हे अल्लाह! मुझे पापों से ऐसे साफ सुथरा करदे जिस प्रकार सफ़ेद कपड़ा मैल कुचैल से साफ़ किया जाता है, हे अल्लाह! मुझे मेरे पापों से जल, बर्फ और ओले के द्वारा धो दे)।
या यह दुआ कहेः ''सुब्हानका अल्लाहुम्मा व बि हम्दिका, व तबारकस्मुका, व तआला जद्दुका, व ला इलाहा ग़ैरुका''। (तू पवित्र है ऐ अल्लाह! हम तेरी प्रशंसा करते हैं, तेरा नाम बरकत वाला है, तेरी महिमा उच्च है तथा तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है)।
6- फिर तअव्वुज़ पढ़े अर्थात यों कहेः अऊज़ुबिल्लाहि मिनश् शैतानिर रजीम'' (मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूं)। 7- फिर बिस्मिल्लाह कहे एवं सूरा फ़ातिहा पढ़े, अर्थात यों कहेः बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम ("शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा दयालु एवं अति कृपावान है।") (الْحَمْدُ للّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ) "सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। (الرَّحْمـنِ الرَّحِيمِ) "जो अत्यंत कृपाशील तथा दयावान है"। (مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ) "जो प्रतिकार (बदले) के दिन का मालिक है"। (إِيَّاكَ نَعْبُدُ وإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ) "(हे अल्लाह) हम तेरी ही उपासना करते हैं तथा तुझ ही से सहायता माँगते हैं"। (اهدِنَــــا الصِّرَاطَ المُستَقِيمَ) "हमें सुपथ (सीधा मार्ग) दिखा"। (صِرَاطَ الَّذِينَ أَنعَمتَ عَلَيهِمْ غَيرِ المَغضُوبِ عَلَيهِمْ وَلاَ الضَّالِّينَ ) "उनका मार्ग, जिनपर तूने पुरस्कार किया, उनका नहीं, जिन पर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनका, जो कुपथ (गुमराह) हो गए''। [सूरा अल-फ़ातिहा: 1-7]
फिर कहेः ''आमीन'' अर्थात: हे अल्लाह! तू क़बूल कर ले।
8- फिर क़ुरआन से जो भी याद हो पढ़े, सुबह की नमाज़ में अधिक क़ुरआन पढ़े।
9- फिर रुकूअ करे, अर्थात अल्लाह के सम्मान में पीठ झुकाए, एवं रुकूअ करते समय तकबीर कहे तथा अपने दोनों हाथों को अपने दोनों कंधों के बराबर उठाए। सुन्नत यह है कि अपनी पीठ को सीधी रखे, सिर को आगे की ओर रखे, एवं अपने दोनों होथों को उनकी उंगलियों को फैलाए हुए दोनों घुटनों पर रखे।
10- रुकूअ में तीन बार कहे: ''سبحان ربي العظيم'' (हे हमारे पाक रब! हम तेरी ही पाकी बयान करते हैं) और यदि ''سبحانك اللهم وبحمدك، اللهم اغفر لي'' (पवित्र है तू ऐ अल्लाह! अपनी प्रशंसा के साथ, हे अल्लाह! तू मुझे क्षमा कर दे) की वृद्धि करे तो उत्तम है।
11- फिर रुकूअ से ''سمع الله لمن حمده'' कहते हुए अपना सर उठाए, और अपने हाथों को अपने दोनों कंधों तक उठाए। परन्तु मुक़्तदी लोग (जो इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ रहे हों) वे ''سمع الله لمن حمده'' न कहें, बल्कि उसके बदले ''ربنا ولك الحمد'' कहें।
12- फिर सर उठाने के बाद कहे: ''ربنا ولك الحمد، ملء السماوات والأرض، وملء ما شئت من شيء بعد'' (ऐ अल्लाह! हमारे रब! तेरी प्रशंसा है, आकाशों के बराबर, ज़मीन के बराबर और इसके बाद तू जो चाहे, उसके बराबर)
13- फिर पहला सज्दा करे, एवं सज्दा करते समय ''अल्लाहु अकबर'' कहे, तथा सात अंगों पर सज्दा करे: पेशानी (ललाट) और नाक, दोनों हथेली, दोनों घुटने तथा दोनों पैर के किनारे। अपने दोनों बाज़ुओं को अपने दोनों किनारों (पहलू, पसली) से दूर रखे, अपने दोनों हाथों को धरती पर न बिछाए, और अपनी उंगलियों के सिरों को क़िबला रुख रखे।
14- और अपने सज्दों में तीन बार कहे: ''سبحان ربي الأعلى'' (हे हमारे उच्च रब! हम तेरी ही पाकी बयान करते हैं) और यदि ''سبحانك اللهم وبحمدك، اللهم اغفر لي'' की वृद्धि करे तो उत्तम है।
15- फिर सज्दा से अपने सर को ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए उठाए।
16- फिर दोनों सज्दों के बीच अपने बायां पैर पर बैठे एवं दायां पैर खड़ा रखे, अपना दायां हाथ घुटना के क़रीब अपने दायें जाँघ पर रखे, अनामिका एवं कनिष्ठा उंगलियों को मुट्ठी के आकर में कर ले, तर्जनी को खड़ी कर ले एवं दुआ कहते हुए उस से इशारा करे, एवं अंगूठा तथा मध्यमा उंगलियों से एक दायरा बनाए। जबकि बायां हाथ बाईं जांघ के घुटने के क़रीब, उंगलियों को फैलाते हुए रखे।
17- दोनों सज्दों के बीच की बैठक में दुआ पढ़ेः वह दुआ इस प्रकार है: "رب اغفر لي وارحمني واهدني وارزقني وعافني" अर्थात, ऐ मेरे रब!, मुझे क्षमा कर दे, मुझपर कृपा कर, मेरा मार्गदर्शन कर, मुझे रोज़ी दे और मुझे कुशल- मंगल रख।
18- फिर पहले सज्दा की तरह दूसरा सज्दा करे, तथा इसमें वही कहे एवं करे जो पहले में कहा तथा किया था, एवं तकबीर कहते हुए सज्दा करे।
19- फिर तकबीर अर्थात अल्लाहु अकबर कहते हुए दूसरे सज्दा से उठे, और पहली रक्अत की तरह ही दूसरी रक्अत पढ़े, नमाज़ शुरू करने की दुआ के सिवा वही कहे एवं करे, जो पहली रक्अत में कहा एवं किया था।
20- फिर दूसरी रक्अत समाप्त करने के बाद तकबीर कहते हुए बैठे, उसी प्रकार जिस प्रकार दोनों सज्दों के बीच बैठा था।
21- इस बैठक में तशह्हुद पढ़े, अतः यों कहे: अत्तहिय्यातो लिल्लाहि, वस्सला-वातो, वत्तैयिबातो, अस्सलामो अलैका अय्युहन्नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू, अस्सलामो अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन, अश्हदु अल ला इलाहा इल्लल्लाहु, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू "(हर प्रकार का सम्मान, समग्र दुआ़एँ एवं समस्त अच्छे कर्म व अच्छे कथन अल्लाह के लिए हैं। हे नबी! आपके ऊपर सलाम, अल्लाह की कृपा तथा उसकी बरकतों की वर्षा हो, हमारे ऊपर एवं अल्लाह के भले बंदों के ऊपर भी सलाम की जलधारा बरसे, मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवाय कोई सत्य माबूद (पूज्य) नहीं एवं मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा उस के रसूल हैं)। अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुम मजीद, अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा बारक्ता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुम मजीद (हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से शांति उतार, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान-संतति पर शांति उतारी थी। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। (ऐ अल्लाह!) मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है)"। फिर इस दुनिया एवं इस दुनिया के बाद की दुनिया (लोक परलोक) की भलाई में से जो उसे पसंद हो, उसकी अल्लाह से प्रार्थना करे।
22- फिर अपनी दायीं ओर ''السَّلام عليكم ورحمة الله'' कहते हुए सलाम फेरे, और इसी प्रकार से बायीं ओर।
23- यदि नमाज़ तीन या चार रक्अतों वाली हो, तो पहले तशह्हुद के अन्त पर रुक जाएगा, और वह है: ''أشهد أن لا إله إلا الله، وأشهد أن محمداً عبده ورسوله'' तक।
24- फिर ''अल्लाहु अकबर'' कहते हुए उठ जाएगा, एवं अपने दोनों हाथों को दोनों कंधों के बराबर उठायेगा।
25- फिर दूसरी रक्अत की तरह ही शेष नमाजों को पढ़ेगा, परन्तु ध्यान रहे कि इन रक्अतों में केवल सूरा फ़ातिहा ही पढ़ेगा।
26- फिर तवर्रुक करते हुए बैठेगा, और वह इस तरह है कि अपने बायां पैर को दायीं पिंडली के नीचे से निकालेगा, एवं धरती पर चूतड़ टिका कर बैठेगा, और अपने हाथों को जांघों के ऊपर उसी प्रकार से रखेगा जिस प्रकार से पहले तशह्हुद में रखा था।
27- इस बैठक में पूरा तशह्हुद पढ़ेगा।
28- फिर अपनी दायीं ओर ''السَّلام عليكم ورحمة الله'' कहते हुए सलाम फेरेगा, और उसी प्रकार बायीं ओर।

प्रश्न 26: नमाज़ से सलाम फेरने के बाद क्या दुआएं पढ़ेगा?

उत्तर- ''أَسْـتَغْفِرُ الله'' (हे अल्लाह! हम तेरी क्षमा चाहते हैं) तीन बार कहे।
फिर कहेः «اللّهُـمَّ أَنْـتَ السَّلامُ، وَمِـنْكَ السَّلام، تَبارَكْتَ يا ذا الجَـلالِ وَالإِكْـرام» ''ऐ अल्लाह! तू ही सुरक्षा तथा शांति का मालिक है और तेरी ही ओर से सुरक्षा एवं शांति प्राप्त होती है। हे प्रताप और सम्मान के आधिपत्य वाले ! तू बड़ी बरकतों वाला है"।
«لا إلهَ إلاّ اللّهُ وحدَهُ لا شريكَ لهُ، لهُ المُـلْكُ ولهُ الحَمْد، وهوَ على كلّ شَيءٍ قَدير، اللّهُـمَّ لا مانِعَ لِما أَعْطَـيْت، وَلا مُعْطِـيَ لِما مَنَـعْت، وَلا يَنْفَـعُ ذا الجَـدِّ مِنْـكَ الجَـد» "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है और उसी के लिए समस्त प्रशंसा है और वह हर काम में सक्षम है। ऐ अल्लाह! जो कुछ तू दे उसे कोई रोकने वाला नहीं है, और जो कुछ तू रोक ले, उसे कोई देने वाला नहीं है, तथा किसी प्रतिष्ठावान व्यक्ति की प्रतिष्ठा तेरे यहाँ कुछ काम नहीं दे सकती"।
«لا إلهَ إلاّ الله، وحدَهُ لا شريكَ لهُ، لهُ الملكُ ولهُ الحَمد، وهوَ على كلّ شيءٍ قدير، لا حَـوْلَ وَلا قـوَّةَ إِلاّ بِاللهِ، لا إلهَ إلاّ الله، وَلا نَعْـبُـدُ إِلاّ إيّـاه، لَهُ النِّعْـمَةُ وَلَهُ الفَضْل وَلَهُ الثَّـناءُ الحَـسَن، لا إلهَ إلاّ الله مخْلِصـينَ لَـهُ الدِّينَ وَلَوْ كَـرِهَ الكـافِرون» "अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी की बादशाहत है, और उसी की सब प्रशंसा है, और वह हर काम में सक्षम है। अल्लाह के अतिरिक्त न कोई भलाई का सामर्थ्य प्रदान कर सकता है और न बुराई से रोकने की क्षमता रखता है। अल्लाह के सिवा कोई सच्चा उपास्य नहीं है, हम केवल उसी की उपासना करते हैं, उसी की सब नेमतें हैं, और उसी का सब पर उपकार है, और उसी के लिए समस्त अच्छी प्रशंसाएँ हैं। अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है, हम उसी के लिए धर्म को विशुद्ध करते हैं, चाहे ये बात काफिरों को नागवार (अप्रिय) लगती हो"।
तैंतीस बार ''سُـبْحانَ اللهِ'' (सुब्हान अल्लाह),
तैंतीस बार ''الحَمْـدُ لله'' (अल्हम्दुलिल्लाह),
तैंतीस बार ''اللهُ أكْـبَر'' (अल्लाहु अकबर) कहे,
फिर एक सौ पूरा करने के लिए कहे:
"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير'' (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं, उसी के लिए राज्य और उसी के लिए सब प्रशंसा है और वह प्रत्येक चीज़ का सामर्थ्य रखता है)।
फ़ज्र तथा मग़्रिब की नमाज़ के बाद तीन बार एवं अन्य नमाज़ों के बाद एक बार सूरा इख़लास़ एवं मुव्वज़ात (क़ुल अऊज़ु बि रब्बिल फ़लक़ एवं क़ुल अऊज़ु बि रब्बिन्नास) पढ़े।
एक बार आयतुल कुर्सी पढ़े।

प्रश्न 27: रवातिब सुन्नतें क्या हैं? उनका क्या महत्व है?

उत्तर- फ़ज्र से पहले दो रक्अत।
ज़ुह्र से पहले चार रक्अत
तथा जुह्र के बाद दो रक्अत।
मग़रिब के बाद दो रक्अत
और इशा के बाद दो रक्अत।
इनकी फ़ज़ीलत:
जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है: जिसने दिन एवं रात की बारह रक्अत सुन्नतें पढ़ी, अल्लाह उसके लिए जन्नत में घर बनाएगा''। इस हदीस़ को मुस्लिम एवं अहमद आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 28: हफ़्ते (सप्ताह) का सर्वोत्तम दिन कौन सा है?

उत्तर- जुमा का दिन, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया है: सबसे अच्छा दिन जुमा का दिन है, इसी दिन आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए थे, इसी दिन उनकी मृत्यु हुई थी, इसी दिन सूर फूंका जाएगा, और इसी दिन क़यामत बरपा होगी। तुम लोग इस दिन मुझ पर अधिक से अधिक दुरूद भेजा करो, क्योंकि तुम्हारे भेजे हुए दुरूद मुझ पर पेश किए जाते हैं''। वर्णनकर्ता कहते हैं: आपके साथियों ने आपसे सवाल किया, हे अल्लाह के रसूल! हमारे दुरूद आप पर कैसे पेश किए जायेंगे, जबकि आप सड़ गल गए होंगे -वे लोग ह़दीस़ में वर्णित शब्द ''अरमता'' का अर्थ ''पुराना होना एवं सड़ गल जाना'' के लेते थे- तो आपने फरमाया: सर्वशक्तिमानअल्लाह ने ज़मीन पर नबियों के शरीरों को हराम कर दिया है''। इस हदीस को अबू दावूद आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 29: जुमुआ की नमाज़ का क्या आदेश है?

उत्तर- प्रत्येक समझ रखने वाले, वयस्क, पुरुष एवं निवासी मुसलमान पर व्यक्तिगत रूप से फ़र्ज़ है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया है:
(يَٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِذَا نُودِيَ لِلصَّلَوةِ مِن يَوۡمِ ٱلۡجُمُعَةِ فَٱسۡعَوۡاْ إِلَى ذِكۡرِ ٱللَّهِ وَذَرُواْ ٱلۡبَيۡعَۚ ذَلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ) ''ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए आवाज़ दी जाए, तो अल्लाह की याद की ओर दौड़ पड़ो, तथा क्रय-विक्रय छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो''। [सूरा अल-मुनाफ़िक़ून: 9]

प्रश्न 30: जुमुआ की नमाज़ में रक्अतों की संख्या कितनी है?

उत्तर- जुमुआ की नमाज़ की रक्अतों की संख्या दो है, जिसमें इमाम बुलंद आवाज़ से क़ुरआन पढ़ेगा। उस से पहले दो ख़ुतबे (भाषण) होते हैं जैसाकि सभी को पता है।

प्रश्न 31: क्या जुमुआ की नमाज़ छोड़ना जायज़ है?

उत्तर- बिना किसी शरई उज़्र (उचित कारण) के जुमुआ की नमाज़ छोड़ना जायज़ नहीं है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित है: "जो व्यक्ति तीन जुमुआ सुस्ती के कारण छोड़ दे अल्लाह (तआला) उसके ह्रदय पर मुहर लगा देगा''| इस हदीस को अबू दावूद आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 32: जुमुआ के दिन की सुन्नतों के बारे में बताइए?

उत्तर-
1- स्नान करना,
2-खुशबु लगाना
3- अच्छा कपड़ा पहनना
4- मस्जिद जल्दी जाना
5- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अधिकाधिक दुरूद भेजना
6- सूरा अल-कह्फ़ पढ़ना
7- पैदल चलकर मस्जिद जाना
8- दुआ क़बूल होने के समय को तलाश करना

प्रश्न 33: जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने का महत्व बयान कीजिए?

उत्तर- अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: जमाअत के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दर्जा (श्रेणी) श्रेष्ठ है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 34: नमाज़ में ख़ुशूअ (श्रद्धा) का क्या अर्थ है?

उत्तर- इसका अर्थ है दिल उपस्थित हो एवं इसके दौरान सारे अंग शांत एवं विनीत हों।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ 1) ''सफल हो गये ईमान वाले", (الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ) "जो अपनी नमाज़ों में विनीत रहने वाले हैं''। [सूरा अल-मोमिनून: 1,2]

प्रश्न 35: ज़कात को परिभाषित करें?

उत्तर- यह विशेष समय में, विशेष लोगों पर, विशेष धन में एक वाजिब हक़ है।
यह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है, यह वाजिब स़दक़ा (दान) है जो मालदार से लेकर ग़रीब को दिया जाता है।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (وَآتُوا الزَّكَاةَ) "तथा ज़कात दो।" [सूरा अल-बक़रा: 43]

प्रश्न 36: मुस्तहब स़दक़ा (जो करे तो बेहतर न करे तो कोई बात नहीं) क्या है?

उत्तर- वह ज़कात के अलावा है, जैसे किसी भी समय भलाई के कामों में ख़र्च करना।
अल्लाह तआला का फ़रमान हैः (وَأَنْفِقُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ) ''और अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करो''। [सूरा अल-बक़रा: 195]

प्रश्न 37: रोज़ा की परिभाषा क्या है?

उत्तर- रोज़ा अल्लाह की इबादत की निय्यत (इरादा) से फ़ज्र प्रकट होने के समय से सुर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से बचे रहने का नाम है। यह दो प्रकार का होता है।
फ़र्ज़ रोज़ा: जैसे कि रमज़ान महीने का रोज़ा, यह इस्लाम के स्तंभों में से एक स्तंभ है।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ) ''ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं, जैसा कि तुम से पहले के लोगों पर अनिवार्य किये गए थे, आशा है कि तुम संयमी एवं धर्मपरायण बन जाओ''। [सूरा अल-बक़रा: 183]
गैर वाजिब रोज़ाः जैसे कि हर हफ़्ते के सोमवार एवं बृहस्पतिवार के रोज़े, हर महीने में तीन दिन के रोज़े, इस में सर्वोत्तम है चंद्र-मास के बीच के दिनों के अय्याम-ए-बीज़ (13, 14, 15 तारीख़) के तीन दिन के रोज़े।

प्रश्न 38: रमज़ान महीना के रोज़े की श्रेष्ठता बताइए?

उत्तर- अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: जिसने ईमान के साथ और नेकी की आशा मन में लिए हुए, रमज़ान के रोज़़े रखे, उसके पिछले सारे (छोटे) गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं''। बुख़ारी एवं मुस्लिम।

प्रश्न 39: रमजान के अलावा अन्य समय में स्वैच्छिक (नफ़्ली) रोज़े की महत्ता का उल्लेख करें?

उत्तर- अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: कोई भी बन्दा यदि अल्लाह के लिए एक दिन का रोज़ा रखता है, तो अल्लाह उस एक दिन के बदले उसके चेहरे को जहन्नम से सत्तर साल दूर कर देता है''। बुख़ारी एवं मुस्लिम।
ह़दीस़ में वर्णित अरबी भाषा का शब्द "सब्ईन् ख़रीफ़न" का अर्थ सत्तर वर्ष है।

प्रश्न 40: रोज़ा को बिगाड़ देने वाली कुछ चीज़ों के बारे में बताएं?

उत्तर- 1- जान बूझकर खा पी लेना
2- जान बूझकर उल्टी करना
3- इस्लाम से फिर जाना

प्रश्न 41: रोज़ा की क्या सुन्नतें हैं?

उत्तर- 1- इफ़्तार (रोज़ा तोड़ने) में जल्दी करना
2- सेहरी करना एवं उसमें देर करना
3- अधिकाधिक भलाई एवं इबादत के कामों को करना
4- जब कोई गाली दे तो रोज़ेदार का यह कहना किः मैं रोज़ा से हूँ
5- इफ़्तार के समय दुआ करना
6- रुत़ब (गीली खजूर) या सुखी खजूर से इफ़्तार करना, यदि यह न मिले तो पानी से

प्रश्न 42: हज्ज को परिभाषित कीजिए?

उत्तर- हज्ज, अल्लाह की इबादत के लिए विशेष समय में, विशेष कार्यों के लिए मक्का में अल्लाह के घर हरम का सफ़र करने को कहते हैं।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ) "अल्लाह तआला ने उन लोगों पर जो इस घर तक पहुंचने के सामर्थी हों, इस घर का हज्ज अनिवार्य किया है, और जो कोई कुफ्र (अर्थात इस आदेश का पालन न करे) तो अल्लाह तआला (उससे बल्कि) पूरे विश्व से निस्पृह है"। [सूरा आले-इमरान: 97]

प्रश्न 43: हज्ज के अरकान (स्तंभों) की संख्या कितनी है?

उत्तर- 1- इहराम
2- अरफ़ा में ठहरना
3- तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा
4- स़फ़ा एवं मरवा पहाड़ी के बीच दौड़

प्रश्न 44: हज्ज का क्या महत्व है?

उत्तर- अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: “जिसने ह़ज्ज किया तथा ह़ज्ज के दिनों में बुरी बात एवं बुरे कार्यों से बचा एवं अवज्ञा से दूर रहा, वह उस दिन की तरह (पवित्र हो कर) लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था”। इसे बुख़ारी इत्यादि ने रिवायत किया है।
जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया'' का अर्थ है बिना किसी गुनाह के।

प्रश्न 45: उमरा क्या है?

उत्तर- उमरा, अल्लाह की इबादत के लिए किसी भी समय में, विशेष कार्यों के लिए मक्का में अल्लाह के घर काबा का सफ़र करने को कहते हैं।

प्रश्न 46: उमरा के अरकान (स्तंभों) की संख्या कितनी है?

उत्तर- 1- इहराम
2- काबा का त़वाफ़
3- स़फ़ा एवं मरवा पहाड़ी के बीच दौड़।

प्रश्न 47: अल्लाह के रास्ते में जिहाद का क्या अर्थ है?

उत्तर- यह इस्लाम को फैलाने और इस्लाम तथा मुसलमानों की रक्षा करने, या इस्लाम तथा मुसलमानों के शत्रुओं से लड़ने के लिए प्रयास और कोशिश करने को कहते हैं।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَجَاهِدُوا بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنْفُسِكُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ) ''और अपने धनों तथा प्राणों से अल्लाह की राह में जिहाद करो, यही तुम्हारे लिए उत्तम है, यदि तुम ज्ञान रखते हो''। [सूरा अल-तौबा: 41]

नबवी जीवन खंड32

प्रश्न 1: हमारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वंशावली क्या है?

मुहम्मद पुत्र अब्दुल्लाह पुत्र अब्दुल मुत्तलिब पुत्र हाशिम है। हाशिम क़ुरैश ख़ानदान से हैं, तथा क़ुरैश एक अरबी ख़ानदान है। और अरब (लोग) इस्माईल पुत्र इब्राहीम ख़लील की औलाद हैं। उन पर तथा हमारे नबी पर सर्वश्रेष्ठ प्रशंसा एवं शांति का अवतरण हो।

प्रश्न 2: हमारे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की माता का नाम क्या है?

उत्तर- आमिना, पुत्री वहब।

प्रश्न 3: आपके पिता की मृत्यु कब हुई थी?

उत्तर- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पिता की मृत्यु मदीना में हुई थी, जब आप गर्भ में ही थे, अभी आपका जन्म नहीं हुआ था।

प्रश्न 4- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का जन्म कब हुआ था?

उत्तर- हाथी वाली घटना के साल, अरबी महीना रबीउल अव्वल में सोमवार के दिन।

प्रश्न 5: आपका जन्म किस शहर में हुआ था?

उत्तर- मक्का में।

प्रश्न 6: आपकी माता के अलावा किस किस ने आपको गोद लिया और दूध पिलाया?

उत्तर- आपके पिता जी की दासी उम्मे ऐमन,
- आपके चचा अबू लहब की दासी स़ुवैबा,
- और हलीमा सादिया

प्रश्न 7- आपकी माता की मृत्यु कब हुई?

उत्तर- जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम छः वर्ष के थे तब आपकी माता की मृत्यु हो गई थी, उनके बाद आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आपकी देख-रेख की।

प्रश्न 8: आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब की मृत्यु के बाद आपको किसने संभाला?

उत्तर- जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आठ साल के बच्चे थे तो आपके दादा जी भी आपको छोड़ कर चले गए, उनके बाद आपके चाचा अबू तालिब ने आपकी देखभाल की।

प्रश्न 9: आपने अपने चचा के साथ शाम (सीरिया) की यात्रा कब की?

उत्तर- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब बारह साल के थे तो आपने अपने चचा के साथ शाम (सीरिया) की यात्रा की।

प्रश्न 10: आपकी दूसरी यात्रा कब हुई?

उत्तर- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दूसरी यात्रा हज़रत खदीज़ा -अल्लाह उनसे राज़ी हो- के माल के साथ व्यापार के सिलसिले में हुई, जब आप यात्रा से लौटे तो हज़रत ख़दीजा के साथ आपका विवाह हुआ। उस समय आपकी आयु पच्चीस वर्ष थी।

प्रश्न 11: क़ुरैश ने काबा को कब दोबारा बनाया?

उत्तर- जब आप पैंतीस वर्ष के थे तो क़ुरैश ने काबा को दोबारा बनाया।
जब वे लोग झगड़ पड़े कि हजर-ए-असवद (काला पत्थर) को उसकी जगह पर कौन रखेगा, तो उन लोगों ने आपको जज बनाया। आपने उसको एक कपड़ा में रखा और हर क़बीला को आदेश दिया कि एक एक कोना पकड़ें, वे कुल चार क़बीले थे। जब वे लोग उसको उठाकर उसकी जगह पर ले आए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ से उसको उसकी जगह में रख दिया।

प्रश्न 12: आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के भेजे जाने (अर्थात नबी बनाए जाने) के समय आपकी आयु कितनी थी? और किन लोगों की ओर आप नबी बनाकर भेजे गए थे?

उत्तर- उस समय आपकी आयु चालीस वर्ष थी, और आपको तमाम लोगों की ओर शुभ संदेश देने वाला एवं डराने वाला बनाकर भेजा गया था।

प्रश्न 13: वह्यी (प्रकाशना, अल्लाह की ओर से भेजा गया पैग़ाम) की शुरूआत कैसे हुई?

उत्तर- इसका आरंभ सच्चे सपनों के द्वारा हुआ, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो भी सपना देखते थे, बिल्कुल वैसा ही घटित होता था।

प्रश्न 14: वह्यी से पहले आपकी हालत कैसी थी? और आप पर पहली बार वह्यी कब उतरी?

उत्तर- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कई कई दिन का खाना ले जाकर हिरा नामी गुफ़ा में अल्लाह की इबादत करते थे,
तो वहीं आप पर वह्यी अवतरित हुई, उस समय आप गुफ़ा में इबादत कर रहे थे।

प्रश्न 15: सबसे पहले क़ुरआन का कौन सा भाग अवतरित हुआ?

उत्तर- अल्लाह तआला का यह कथन: (ٱقۡرَأۡ بِٱسۡمِ رَبِّكَ ٱلَّذِي خَلَقَ 1) ''अपने रब के नाम से पढ़, जिसने पैदा किया"। (خَلَقَ ٱلۡإِنسَـنَ مِنۡ عَلَقٍ 2) "जिसने मनुष्य को रक्त के लोथड़े से पैदा किया"। (ٱقۡرَأۡ وَرَبُّكَ ٱلۡأَكۡرَمُ 3) :पढ़ और तेरा रब बड़ा करम (उदारता) वाला है"। (ٱلَّذِي عَلَّمَ بِٱلۡقَلَمِ 4) "जिसने क़लम के द्वारा सिखाया"। (عَلَّمَ ٱلۡإِنسَـنَ مَا لَمۡ يَعۡلَمۡ 5) "उसने इनसान को वह सिखाया, जो वह नहीं जानता था''। [सूरा अल-अलक़: 1-5]

प्रश्न 16: आपके पैग़ाम पर सबसे पहले कौन ईमान लाया?

उत्तर- पुरुषों में से: अबू बक्र अल-स़िद्दीक़, महिलाओं में से: ख़दीजा पुत्री ख़ुवैलिद, बच्चों में से: अली पुत्र अबू तालिब, सेवकों में से: ज़ैद बिन हारिस़ा और ग़ुलामों में से बिलाल हब्शी, अल्लाह उन सबसे एवं समस्त दूसरे स़हाबा से राज़ी हो।

प्रश्न 17: आरंभ में इस्लाम की दावत (आह्वान) की स्थिति क्या थी?

उत्तर- पहले तीन वर्ष तक यह काम छुप छुपाकर होता था, फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपनी दावत का एलान करने का आदेश दिया गया।

प्रश्न 18: दावत के एलान के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एवं जो लोग आप पर ईमान लाए, उनका क्या हाल हुआ?

उत्तर- मुश्रिकों अर्थात बहुदेववादियों ने आप को तथा मुसलमानों को बहुत कष्ट दिया, यहाँ तक कि मुसलमानों को हब्शा में नजाशी बादशाह की ओर हिजरत (पलायन) करने की अनुमति दे दी गई।
मुश्रिकों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को तकलीफ़ देने एवं आपकी हत्या करने पर सहमति कर ली, तो अल्लाह ने आपको बचाया और आपके चचा को आपके इर्द-गिर्द दीवार बनाकर खड़ा कर दिया ताकि वह आपको उनसे बचाएं।

प्रश्न 19: आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने के दसवें वर्ष किसकी मृत्यु हुई?

उत्तर- आपके चचा अबु तालिब एवं आप की पत्नी ख़दीजा -अल्लाह उनसे राज़ी हो- दोनों की मृत्यु हुई।

प्रश्न 20: इसरा व मेअराज कब हुआ?

उत्तर- जब आपकी आयु पच्चास वर्ष की थी, और उसी में आप पर पाँच वक़्त की नमाज़ें फ़र्ज़ हुईं।
इसरा:
मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़स़ा तक था।
मेअराज:
मस्जिद-ए-अक़स़ा से आसमान की ओर सिदरतुल मुन्तहा तक था।

प्रश्न 21: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का के बाहर लोगों को कैसे दीन की ओर बुलाते थे?

उत्तर- आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ताइफ़ वालों को दावत दी, इसी तरह आप ह़ज्ज के मौसम, त्योहारों एवं लोगों की भीड़ में अपने आपको पेश करते, यहाँ तक कि मदीना से कुछ अंसार लोग आए, तथा वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान ले आए और आपकी मदद करने की शपथ उठाई।

प्रश्न 22: आपकी दावत मक्का में कितने दिनों तक जारी रही?

उत्तर- तेरह सालों तक।

प्रश्न 23: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहाँ हिजरत की?

उत्तर- मक्का से मदीना ओर।

प्रश्न 24: आप मदीना में कितने दिनों तक जीवित रहे?

उत्तर- दस वर्षों तक।

प्रश्न 25: मदीना में इस्लामी विधी विधान में से क्या क्या लागू हुए?

उत्तर- ज़कात, रोज़ा, हज्ज, जिहाद, अज़ान के फ़र्ज़ होने के साथ साथ दूसरे इस्लामी क़ानून लागू हुए।

प्रश्न 26: आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रमुख युद्ध (गज़वात ) कौन कौन से हैं?

उत्तर- बद्र की जंग,
उहुद की जंग,
अहज़ाब की जंग
एवं मक्का विजय का युद्ध।

प्रश्न 27: सबसे अंत में क़ुरआन का कौन सा भाग अवतरित हुआ?

उत्तर- अल्लाह तआला का यह कथन: (وَٱتَّقُوا يوۡمًا تُرۡجَعُونَ فِيهِ إِلَى ٱللَّهِۖ ثُمَّ تُوَفَّى كُلُّ نَفۡسٍ مَّا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ 281) ''तथा उस दिन से डरो, जिसमें तुम अल्लाह की ओर लौटाए जाओगे, फिर प्रत्येक प्राणी को उसके किए हुए का पूरा बदला दिया जाएगा, तथा उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा''। [सूरा अल-बक़रा: 281]

प्रश्न 28: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का देहांत कब हुआ, और उस समय आपकी आयु क्या थी?

उत्तर- हिजरत के ग्यारहवें वर्ष, रबिउल अव्वल के महीना में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु हुई, तथा उस समय आपकी आयु तिरसठ वर्ष थी।

प्रश्न 29: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद रज़ियल्लाहु अन्हा।
2- सौदा बिन्त ज़म्आ रज़ियल्लाहु अन्हा।
3- आइशा बिन्त अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हा।
4- हफ़्स़ा बिन्त उमर रज़ियल्लाहु अनहा।
5- ज़ैनब बिन्त ख़ुज़ैमा रज़ियल्लाहु अन्हा।
6- उम्मे सलमह हिन्द बिन्त अबू उमय्या रज़ियल्लाहु अन्हा।
7- उम्मे ह़बीबा बिन्त अबू सुफ़्यान रज़ियल्लाहु अन्हा।
8- जुवैरिया बिन्त ह़ारिस रज़ियल्लाहु अन्हा।
9- मैमूना बिन्त ह़ारिस रज़ियल्लाहु अन्हा।
10- सफ़िय्या बिन्त ह़ुय्य रज़ियल्लाहु अन्हा।
11- ज़ैनब बिन्त जह़श रज़ियल्लाहु अन्हा।

प्रश्न 30: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की औलाद कौन कौन थे?

उत्तर- तीन लड़के:
क़ासिम, इन्हीं की वजह से आपको अबु अल-क़ासिम कहा जाता है।
अब्दुल्लाह।
और इब्राहीम।
लड़कियां:

फ़ातिमा।
रुक़य्या।
उम्मे कुलसूम।
ज़ैनब।
इब्राहीम के अलावा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सभी औलाद ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा से थीं, और सभी की मृत्यु आप से पहले ही हो गई थी, सिवाय फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के जिनकी मृत्यु आपके देहांत के छः महीने बाद हुई थी।

प्रश्न 31: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कुछ शारीरिक गुणों के बारे में बताएं?

उत्तर- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक मध्यम कद के आदमी थे, न लंबे और न नाटे, बल्कि उसके बीच बीच। आपका रंग लालिमा लिए हुए गोरा था, घनी दाढ़ी, आँखें कुशादा , बड़ा मुँह, बाल बहुत काले, चौड़ा कंधा और आपकी ख़ुशबू बहुत अच्छी थी, इसके अलावा भी आपके अंदर अनेक सुन्दर गुण थे।

प्रश्न 31: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को किस पर छोड़ा?

उत्तर- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी उम्मत को एक प्रकाशमान स्पष्ट मार्ग पर छोड़ा, उसकी रात भी उसके दिन की तरह प्रकाशमान है, उससे वही भटक सकता है जो बर्बाद होना चाहता है। आपने अपनी उम्मत को हर भलाई का रास्ता दिखा दिया एवं उसे हर बुराई से सचेत कर दिया।

तफ़सीर (क़ुरआन की व्याख्या) का खंड17

प्रश्न 1: सूरा फ़ातिहा पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा फ़ातिहा और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील तथा दयावान है। "समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का रब है। जो अत्यंत कृपाशील तथा दयावान है। जो प्रतिकार (बदले) के दिन का मालिक है। (हे अल्लाह) हम तेरी ही उपासना करते हैं तथा तुझ ही से सहायता माँगते हैं। हमें सुपथ (सीधा मार्ग) दिखा। उनका मार्ग, जिनको तूने पुरष्कृत किया। उनका नहीं, जिन पर तेरा प्रकोप हुआ और न ही उनका, जो कुपथ (गुमराह) हो गए।" [सूरा अल-फ़ातिहा: 1-7]
तफ़सीर (व्याख्या):
सूरा फ़ातिहा को फ़ातिहा (खोलने वाला) इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके द्वारा अल्लाह की किताब की शुरूआत होती है।
🎧 1- ''बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम'' बिस्मिल्लाह का अर्थ है कि मैं आरंभ करता हूँ क़ुरआन पढ़ना, अल्लाह के नाम की बरकत से एवं उससे मदद माँगते हुए।
अल्लाह'' अर्थात सत्य पूज्य, उसके अतिरिक्त इस नाम किसी अन्य को नहीं दिया जा सकता है।
अर-रहमान'' (कृपाशील): व्यापक कृपा का मालिक, जिसकी कृपा हर चीज़ को शामिल है।
अर-रहीम'' अर्थात मोमिनों पर रहम करने वाला।
🎧 2- ''अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बि अल-आलमीन'' अर्थात: सभी प्रकार की प्रशंसा एवं कमाल केवल एक अल्लाह के लिए है, जो सारे जहानों का रब है।
🎧 3- ''अर-रहमानिर रहीम'' अर्थात: जो व्यापक रहमत वाला है, जिसकी रहमत हर चीज़ को शामिल है, और उसकी दया व कृपा मोमिनों तक पहुँचती है।
🎧 4- ''मालिकि यौमिद्दीन'' जो क़यामत के दिन का मालिक है।
🎧 5- ''इय्याका नअ्बुदु व इय्याका नस्तईन'' अर्थात: हे अल्लाह! हम केवल तेरी ही इबादत करते हैं और केवल तुझ से ही मदद माँगते हैं।
🎧 6- ''इहदिनस़् स़िरात़ल मुसतक़ीम'': हमें सीधा मार्ग दिखा, अर्थात: इस्लाम एवं सुन्नत का मार्ग।
🎧 7- ''स़िरात़ल लज़ीना अन्अम्ता अलैहिम, ग़ैरिल मग़ज़ूबि अलैहिम, वलज़् ज़ाल्लीन'' अर्थात: तू हमें अपने नेक बन्दों यानी नबियों एवं उनके अनुयायियों का मार्ग दिखा, जिन पर तूने पुरस्कार किया है, न कि यहूद व ईसाइयों का मार्ग, जो पथभ्रष्ट हो गए।
सुन्नत यह है कि इस सूरा को पढ़ने के बाद ''आमीन'' कहा जाए, अर्थात: हे अल्लाह! इसे क़बूल कर ले।

प्रश्न 2: सूरा ज़लज़ला पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा ज़लज़ला और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
जब धरती को पूरी तरह झंझोड़ दिया जायेगा। तथा भूमि अपने बोझ बाहर निकाल देगी। और इन्सान कहेगा कि इसे क्या हो गया है? उस दिन वह अपनी सभी सूचनायें वर्णन कर देगी। क्योंकि तेरे पालनहार ने उसे यही आदेश दिया है। उस दिन लोग तितर-बितर होकर आयेंगे, ताकि वे अपने कर्मों को देख लें। "तो जिस ने कण (ज़र्रे) के बराबर भी पुण्य (नेकी) किया होगा, वह उसे देख लेगा। और जिसने एक कण के बराबर भी बुरा कर्म किया होगा, वह उसे देख लेगा''। [सूरा अल-ज़लज़ला: 1-8]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''इज़ा ज़ुलज़िलतिल अरज़ु ज़िलज़ालहा'', जब धरती को पूरी तरह झंझोड़ दिया जायेगा, और ऐसा क़यामत के दिन होगा।
🎧 2- ''व उख़रिजतिल अरज़ु अस़क़ालहा'', अर्थात: धरती के सीने में जो कुछ है मुर्दों वग़ैरह में से, वह सब बाहर निकाल कर फेंक देगी।
🎧 3- ''व क़ालल इंसानु मालहा'', अर्थात: इंसान हैरान होकर कहेगा किः इस धरती को क्या हो गया है, हिल रही है, परेशान है, सब कुछ को निकाल कर फेंक रही है?
🎧 4- ''यौमइज़िन तुहद्दिस़ु अख़बारहा'', अर्थात: उस महान दिन, धरती पर जो अच्छाई और बुराई की गई है, धरती उसे बयान कर देगी।
🎧 5- ''बिअन्ना रब्बका औह़ा लहा'' और वह ऐसा इसलिए करेगी क्योंकि अल्लाह उसे आदेश देगा तथा ऐसा करने को कहेगा।
🎧 6- ''यौमइज़ीं,यस़दुरुन् नासु अश्तातल लियुरौ आमालहुम'', अर्थात: उस महान दिन में, जब धरती ज़ोर-ज़ोर से हिलाई जाएगी, लोग हिसाब के स्थान से समूहों में निकलेंगे, ताकि वे दुनिया में अपने किए हुए कामों को देखें।
🎧 7- ''फ़मैंय् यअ्मल मिस़क़ाला ज़र्रतिन खैरैंय् यरहु'', तो जो कोई एक चींटी या कण बराबर भी अच्छा तथा नेकी का काम किया होगा, वह उसे अपने सामने देखेगा।
🎧 8- ''वमैंय् यअ्मल मिस़क़ाला ज़र्रतिन शर्रैंय यरहु'', और जो कोई कण के बराबर भी बुरा काम किया होगा, वह उसे अपने समक्ष देखेगा।

प्रश्न 3: सूरा अल-आदियात पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-आदियात और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
उन घोड़ों की शपथ जो दौड़ कर हाँफ जाते हैं। फिर पत्थरों पर टाप मार कर चिंगारियाँ निकालने वालों की शपथ। फिर प्रातः काल में धावा बोलने वालों की शपथ। जो (अपनी दौड़ के द्वारा) धूल उड़ाते हैं। फिर सेना के बीच घुस जाते हैं। वास्तव में, इन्सान अपने रब का बड़ा कृतघ्न (नाशुकरा) है। निश्चित रूप से, वह इसपर स्वयं साक्षी (गवाह) है। और बेशक वह धन से बड़ा प्रेम रखता है। क्या वह उस समय को नहीं जानता, जब क़ब्रों में जो कुछ है, निकाल लिया जायेगा? और सीनों के भेद प्रकाश में लाये जायेंगे? निश्चय उनका रब उस दिन उनसे पूर्ण रूप से सूचित होगा। [सूरा अल-आदियात: 1-11]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 'वल आदियाति ज़ब्हन'', अल्लाह ने इस आयत में उन घोड़ों की क़सम खाई है, जो दौड़ते हैं, यहाँ तक कि उनके तेज़ दौड़ने के कारण उनकी साँसों की आवाज़ सुनाई देती है।
🎧 2- ''फलमूरियाति क़द्हन'', और उन घोड़ों की क़सम खाई है, जिनके खुर जब चट्टानों पर तेज़ी से पड़ते हैं, तो उनसे चिंगारियाँ निकलती हैं।
🎧 3- ''फलमुग़ीराति स़ुब्हन'', फिर उन घोड़ों की क़सम खाई है जो स़ुबह के समय दुश्मनों पर हमला बोल देते हैं।
🎧 4- ''फ़अस़र्ना बिहि नक़अन'', और उनके दौड़ने के कारण धूल उड़ते हैं।
🎧 5- ''फ़वसत़्ना बिहि जम्अन'', अर्थात: वह दुश्मनों की पंक्तियों में घुस जाते हैं।
🎧 6- ''इन्नल इंसाना लिरब्बिही लकनूद'', अर्थात: इंसान अपने पालनहार का बड़ा कृतघ्न है, वह उस भलाई का इंकार करता है जो उसका रब उससे चाहता है।
🎧 7- ''व इन्नहु अला ज़ालिका ल शहीद'', वह स्वयं इस पर गवाह है कि वह भलाई से रोकने वाला है, उसके स्पष्ट होने के कारण वह उसका इंकार कर ही नहीं सकता।
🎧 8- ''व इन्नहु लि हुब्बिल ख़ैरि ल शदीद'', वह धन व माल को अत्यधिक चाहने के कारण उसमें कंजूसी से काम लेता है।
🎧 9- ''अफ़ला यअ्लमु इज़ा बुअ्स़िरा मा फिल क़ुबूरि'', अर्थात: क्या सांसारिक जीवन के धोखे में पड़ा हुआ यह इनसान नहीं जानता, जब अल्लाह क़ब्रों में मौजूद मुर्दों को पुनर्जीवित करेगा और उन्हें हिसाब और बदले के लिए ज़मीन से बाहर निकालेगा कि मामला वैसा नहीं था, जैसा उसने समझ रखा था?!
🎧 10- ''व हुस़्स़िला मा फिस़्स़ुदूर'', अर्थात दिलों में नियतों, विश्वासों तथा आस्थाओं आदि में से जो कुछ है सब जग जाहिर हो जाएंगे।
🎧 11- ''इन्ना रब्बहुम बिहिम यौमइज़िन ल ख़बीर'', निश्चय उनका रब उस दिन उनकी पूरी खबर रखने वाला है, उससे उसके बंदों की कोई बात छिपी नहीं है और वह उन्हें उसका बदला देगा।

पश्न 4: सूरा अल-क़ारिया पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-क़ारिया और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
वह खड़खड़ा देने वाली। क्या है वह खड़खड़ा देने वाली? और तुम क्या जानो कि वह खड़खड़ा देने वाली (क़यामत) क्या है? जिस दिन लोग, बिखरे पतिंगों के समान (व्याकूल) होंगे। और पर्वत, धुनी हुई ऊन के समान उड़ेंगे। तो जिसका (पुण्य का) पलड़ा भारी होगा। तो वह मनचाहे सुख में होगा। तथा जिसके (पुण्य के) पलड़े हल्के होंगे। उसका ठिकाना हाविया होगा। और तुम क्या जानो वह (हाविया) क्या है? वह दहकती हुई आग है। [सूरा अल-क़ारिया: 1-11]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''अल्क़ारिअ्तु'', वह क़यामत की घड़ी जो अपनी भयावहता के कारण लोगों के दिलों को झंझोड़ देगी?!
🎧 2- ''मल्क़ारिअ्तु'' क्या है वह क़यामत की घड़ी जो अपनी भयावहता के कारण लोगों के दिलों को झंझोड़ देगी?!
🎧 3- ''व मा अद्राका मल्क़ारिअ्तु'', और (ऐ रसूल) आपको क्या पता कि वह कौन-सी घड़ी है, जो अपनी भयावहता के कारण लोगों के दिलों को झंझोड़ देगी?! निश्चय ही वह क़यामत का दिन है।
🎧 4- ''यौम यकूनुन नासु कल्फ़राशिल मबस़ूस़ि'', अर्थात उस दिन लोगों के दिल इतने भयभीत होंगे कि वे उड़ते हुए पतिंगों की तरह होंगे, कभी यहाँ कभी वहाँ।
🎧 5- ''व तकूनुल जिबालु कल इहनिल मनफ़ूश'', पहाड़ चलने एवं हरकत करने में इतने हल्के हो जाएंगे कि मानो धुनी हुई रूई के समान रेज़ा रेज़ा (सूक्ष्म खंड) हों।
🎧 6- ''फ़अम्मा मन स़क़ुलत मवाज़ीनुहू'', अर्थात जिनके नेक कार्य बुराई के कार्य की तुलना में अधिक होंगे।
🎧 7- ''फ़हुवा फ़ी ईशतिर राज़ियातिन'', अर्थात वह अपने मन मुताबिक सुख में होगा, जन्नत में वह जो चाहेगा, मिलेगा।
🎧 8- ''व अम्मा मन ख़फ़्फ़त मवाज़ीनुहू'', और जिसके बुरे कार्य उसके भले कार्य से अधिक होंगे।
🎧 9- ''फ़उम्मुहू हावियतुन'', तो क़यामत के दिन उसका आश्रय व ठिकाना जहन्नम होगा।
🎧 10- ''व मा अदराका माहियह'', और हे रसूल! तुमको क्या ख़बर कि वह हाविया क्या है?
🎧 11- ''नारुन हामियतुन'', अर्थात वह ऐसी आग है जो अत्यधिक धधकी हुई है।

प्रश्न 5: सूरा अल-तकास़ुर पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-तकास़ुर और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
तुम्हें अधिक (धन) की चाहत ने मग्न कर दिया। यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तान जा पहुँचे। निश्चय तुम्हें ज्ञान हो जायेगा। फिर निश्चय ही तुम्हें ज्ञान हो जायेगा। वास्तव में, यदि तुम्हें विश्वास होता (तो अधिक धन की चाहत न करते)। तुम जहन्नम को अवश्य देखोगे। फिर उसे विश्वास की आँख से देखोगे। फिर उस दिन तुमसे सुख सम्पदा के विषय में अवश्य पूछ गछ होगी। [सूरा अल-तकास़ुर: 1-8]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''अलहाकुम अत्तकास़ुरु'',(ऐ लोगो) तुम्हें धन और संतान पर आपस में गर्व ने अल्लाह की आज्ञाकारिता से बेख़बर कर दिया।
🎧 2- ''ह़त्ता ज़ुरतुमुल मक़ाबिर'', यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तान जा पहुँचे, अर्थात, मर गए और अपनी अपनी क़बरों में जा पहुँचे।
🎧 3- ''कल्ला सौफ़ा तअ्लमून'' शीघ्र ही तुम्हें पता चल जायेगा कि धन और संतान के गर्व में पड़कर अल्लाह की आज्ञाकारिता से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए था। तुम्हें जल्द ही उस ग़फ़लत का परिणाम पता चल जाएगा।
🎧 4- ''स़ुम्मा कल्ला सौफ़ा तअ्लमून'', फिर उस दिन तुम इस लापरवाही के अंजाम को जान जाओगे।
🎧 5- ''कल्ला लौ तअ्लमूना इल्मल यक़ीनि'', अर्थात, वास्तव में, यदि तुम निश्चित तौर पर जान लेते कि तुम उठाए जाओगे, और अल्लाह के पास ले जाए जाओगे, और यह कि वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा; तो तुम धन और संतान पर आपस में गर्व करने में व्यस्त न होते।
🎧 6- ''लतरवुन्नल जह़ीम'', तुम अवश्य ही क़यामत के दिन आग देखोगे।
🎧 7- ''स़ुम्मा लतरवुन्नहा ऐनल यक़ीनि'', इसका अर्थ है कि तुम अपनी आँखों से देखोगे, तब तुम्हें विश्वास हो जाएगा, और कोई संदेह बाक़ी नहीं रहेगा।
🎧 8- ''स़ुम्मा लतुस्अलुन्ना यौमइज़िन अनिन नईम'', फिर उस दिन अल्लाह तुमसे उन नेमतों के बारे में अवश्य पूछेगा, जो उसने तुम्हें स्वास्थ्य और धन आदि के रूप में प्रदान की हैं।

प्रश्न 6: सूरा अल-अस़्र पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-अस़्र और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
सौगन्ध है काल (ज़माना) की। निस्संदेह, (सारे) लोग घाटे में हैं। सिवाय उन लोगों के, जो ईमान लाए, नेक काम किए तथा एक-दूसरे को सत्य को अपनाने की नसीहत करते रहे और धैर्य का उपदेश देते रहे। [सूरा अल-अस्र्: 1-3]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''वल अस्रि'' पाक व पवित्र अल्लाह ने युग की क़सम खाई है।
🎧 2- ''इन्नल इंसाना लफ़ी ख़ुसरिन'', अर्थात, सभी इंसान नुक़सान एवं बर्बादी में हैं।
🎧 3- ''इल्लल लज़ीना आमनू व अमिलुस़् स़ालिहाति, व तवास़ौ बिल् हक़्क़ि व तवास़ौ बिस़्स़ब्रि'', अर्थात केवल वही लोग घाटे एवं बर्बादी में नहीं हैं जो ईमान लाए, नेक काम किए, सत्य की ओर लोगों को बुलाया एवं इस रास्ते में जो कठिनाइयाँ मिलीं, उन पर धैर्य से काम लिया। वही लोग नुक़सान से बच गए।

प्रश्न 7: सूरा अल-हुमज़ा पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-हुमज़ा और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
विनाश हो उस व्यक्ति का, जो कचोके लगाता रहता है और चोट करता रहता है। जिसने धन एकत्र किया और उसे गिन-गिन कर रखा। क्या वह समझता है कि उसका धन उसे संसार में सदा रखेगा? कदापि ऐसा नहीं होगा। वह अवश्य ही 'ह़ुत़मा' में फेंका जायेगा। और तुम क्या जानो कि ह़ुत़मा क्या है? वह अल्लाह की भड़काई हुई अग्नि है। जो दिलों तक जा पहूँचेगी। वह अग्नि, उन पर बन्द कर दी जाएगी। लँबे-लँबे स्तंभों में। [सूरा अल-हुमज़ा: 1-9]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''वैलुल्लि कुल्लि हुमज़तिल लुमज़तिन'', मुसीबत एवं भयंकर अज़ाब है उन लोगों के लिए जो दूसरों की बुराई बयान करते हैं एवं उनमें अवगुण तलाश करते हैं।
🎧 2- ''अल्लज़ी जमअ मालव्ं व अद्ददहू'', और उन लोगों के लिए अज़ाब है जिनका उद्देश्य मात्र धन जमा करना एवं उसे गिन कर रखना है, इसके सिवा उनका कोई उद्देश्य नहीं है।
🎧 3- ''यहसबु अन्ना मालहु अख़लदहु'' वह समझता है कि उसका माल जो उसने जमा किया है, उसे मौत से बचा लेगा और वह दुनिया में अमर रहेगा।
🎧 4- ''कल्ला लयुंबज़न्ना फिल हुत़मति'', अर्थात, मामला वैसा नहीं है, जैसा कि इस जाहिल ने कल्पना की है, निश्चय ही वह ज़रूर जहन्नम की आग में फेंका जाएगा, जो इतनी शक्तिशाली है कि उसमें डाली गई हर चीज़ को तोड़कर रख देगी।
🎧 5- ''व मा अदराका मल हुत़मा'', और (ऐ रसूल) आपको क्या पता कि यह कौन सी आग है, जो उसमें डाली गई हर चीज़ को चूर कर देगी?!
🎧 6- ''नारुल्लाहिल मू,क़दतु'', यह अल्लाह की सुलगाई हुई आग है।
🎧 7- ''अल्लती तत़्त़लिउ अलल अफ़इदति'' अर्थात जो लोगों के शरीरों से होकर दिलों तक पहुँच जाएगी।
🎧 8- ''इन्नहा अलैहिम मुअस़दतुन'', अज़ाब पाने वाले उसमें बंद कर दिए जाएंगे।
🎧 9- ''फ़ी अमदिम् मुमद्ददतिन'', अर्थातः लंबे-लंबे खंबों से बांध दिए जाएंगे, ताकि वो उससे निकल न पाएं।

पश्न 4: सूरा अल-फ़ील पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-फ़ील और उसकी तफ़सीर:
(अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
क्या तुमने नहीं देखा कि तेरे रब ने हाथी वालों के साथ क्या किया? क्या उसने उनकी चाल को विफल नहीं कर दिया? और उनपर पंक्षियों के दल भेजे। जो उनपर पकी कंकरी के पत्थर फेंक रहे थे। तो उन्हें कर दिया भूसा की तरह)
। [सूरा अल-फ़ील: 1-5]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''अलम तरा कैफ़ा फ़अ्ला रब्बुका बि अस़हाबिल फ़ील'', हे रसूल! क्या आप नहीं जानते कि आपके रब ने अब्रहा एवं उसके साथियों, -जो हाथी वालों के नाम से जाने जाते हैं- के साथ क्या किया, जब उन लोगों ने काबा को ध्वस्त करना चाहा?!
🎧 2- ''अलम यजअल कैदहुम फ़ी तज़लील'', अर्थात अल्लाह ने उनकी काबा को गिराने की दुष्ट चाल को नाकाम कर दिया, अतः उन्होंने काबा से लोगों को फेरने की जो इच्छा की थी, उसे वो पूरी नहीं कर सके और न ही वे काबा को कोई नुक़सान पहुँचा सके।
🎧 3- ''व अरसला अलैहिम त़ैरन अबाबील'', अल्लाह ने उनपर चिड़ियों को झुंड के झुंड भेजा।
🎧 4- ''तरमीहिम बिह़िजारतिम मिन सिज्जील'', उन चिड़ियों ने उनपर पकी हुई मिट्टी के पत्थरों की बारिश कर दी।
🎧 5- ''फ़जअ्लहुम कअस़फ़िम मअ्कूल'', तो अल्लाह ने उन्हें खाए तथा रौंदे हुए भूसे की तरह कर दिया।

प्रश्न 9: सूरा क़ुरैश पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा क़ुरैश एवं उसकी व्याख्या:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
कुरैश के स्वभाव बनाने के कारण। उनके जाड़े तथा गर्मी की यात्रा का स्वभाव बनाने के कारण। उन्हें चाहिये कि इस घर (काबा) के रब की इबादत करें। जिसने उन्हें भूख में खिलाया तथा डर में अमन दिया''। [सूरा क़ुरैश: 1-4]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''लिईलाफ़ि क़ुरैशिन'', इसका अर्थ यह है कि हम ने जो अब्रहा के साथ किया वह क़ुरैश को गर्मी एवं जाड़े की यात्रा के स्वभाव बनाने के लिए किया।
🎧 2- ''ईलाफ़िहिम रिह़लतश् शिताइ वस़्स़ैफ़'', जाड़े में यमन की ओर एवं गर्मी में शाम की ओर शांतिपूर्ण यात्रा।
🎧 3- ''फ़लयअ्बुदू रब्बा हाज़ल बैत'', (इस उपकार के कारण) उन्हें चाहिए कि केवल इस सम्मानित घर के मालिक अल्लाह की इबादत करें, जिसने उनके लिए इस यात्रा की सुविधा प्रदान की, और उसके साथ किसी को साझी न बनाएं।
🎧 4- ''अल्लज़ी अत्अमहुम मिन जूइन व आमनहुम मिन ख़ौफ़िन'', अल्लाह तआला ने अरब के दिलों में काबा एवं वहाँ के रहने वालों का सम्मान बिठा दिया, इससे उन्हें अमन भी प्राप्त हुआ एवं खाने का प्रबंध भी हुआ।

प्रश्न 10: सूरा अल-माऊन पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-माऊन और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
(हे नबी!) ''क्या तुमने उसे देखा, जो प्रतिकार (बदले) के दिन को झुठलाता है? यही वह है, जो अनाथ (यतीम) को धक्का देता है। और ग़रीब को भोजन देने पर नहीं उभारता। विनाश है उन नमाज़ियों के लिए, जो अपनी नमाज़ से अचेत हैं। और जो दिखावा (आडंबर) करते हैं। एवं प्रयोग में आने वाली सामान्य चीज़ों को देने से मना कर देते हैं''। [सूरा अल-माउन: 1-7]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''अ,रऐतल्लज़ी युकज़्ज़िबु बिद्दीन'', क्या आपने जाना उसको जो क़यामत के दिन के बदले को नकारता है।
🎧 2- ''फ़ज़ालिकल्लज़ी यदुअ्उल यतीम'', वह वही है जो अनाथ को आवश्यकता पूर्ति करने से डाँट कर भगा देता है।
🎧 3- ''व ला यहुज़्ज़ु अला त़आमिल मिस्कीनि'', अर्थात वह फ़कीरों, गरीबों को न स्वयं खाना देता है और न ही दूसरों को खाना देने के लिए प्रेरित करता है।
🎧 4- ''फ़वैलुल्लिल मुस़ल्लीना'', बर्बादी एवं यातना है उन नमाज़ियों के लिए।
🎧 5- ''अल्लज़ीना हुम अन स़लातिहिम साहूना'', जो नमाज़ी अपनी नमाज़ की परवाह नहीं करते हैं और न ही उनके निर्धारित समय का ख़याल करते हैं।
🎧 6- ''अल्लज़ीना हुम युराऊना'', जो केवल दिखाने के लिए नमाज़ पढ़ते हैं या नेक काम करते हैं, अपने काम को लेकर अल्लाह के प्रति निष्ठावान नहीं हैं।
🎧 7- ''व यमनऊनल माऊन'' और वे ऐसी चीज़ के द्वारा भी दूसरों की मदद करने से कतराते हैं, जिससे मदद करने में कोई नुक़सान नहीं है।

प्रश्न 11: सूरा अल-कौस़र पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-कौस़र और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
(हे नबी!) ''हमने तुम्हें कौस़र प्रदान किया है। अपने रब के लिये नमाज़ पढ़ो और कुर्बानी करो। निःसंदेह तुम्हारा शत्रु ही बे नाम व निशान है''। [सूरा अल-कौस़र: 1-3]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''इन्ना अअ्त़ैनाक्ल-कौस़र'' (ऐ रसूल) हमने आपको ढेर सारी भलाई प्रदान की है, और उसी में से एक जन्नत में कौस़र नामक नहर भी है।
🎧 2- ''फ़स़ल्लि लि रब्बिका वन्ह़र'' अतः आप इस नेमत पर अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए केवल उसी के लिए नमाज़ पढ़िए और क़ुर्बानी कीजिए; मुश्रिकों के प्रचलन के विपरीत जो अपनी मूर्तियों की निकटता प्राप्त करने के लिए बलि देते हैं।
🎧 3- ''इन्ना शानिअका हुवल अब्तर'', अर्थात, निःसंदेह आपसे द्वेष रखने वाला ही हर भलाई से वंचित और भुलाया हुआ है, जिसे यदि याद भी किया जाता है, तो बुराई के साथ याद किया जाता है।

प्रश्न 12: सूरा अल-काफ़िरून पढ़ें और उसकी तफ़सीर करें?

उत्तर- सूरा अल-काफ़िरून और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
(हे नबी!) ''कह दें किः हे काफ़िरो! मैं उन (मूर्तियों) को नहीं पूजता, जिन्हें तुम पूजते हो। और न तुम उसे पूजते हो, जिसे मैं पूजता हूँ। और न मैं उन मूर्तियों की इबादत करने वाला हूँ, जिनकी तुमने पूजा की है। और न तुम उसे पूजने वाले हो, जिसे मैं पूजता हूँ। तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है''। [सूरा अल-काफ़िरून: 1-6]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''क़ुल या अय्युहल काफ़िरून'', हे रसूल! आप कह दें किः हे अल्लाह को झुठलाने वालो!
🎧 1- ''ला अअ्बुदु मा तअ्बुदून'', कि मैं न अभी और न भविष्य में उन मूर्तियों की उपासना करुँगा जिनकी तुम पूजा करते हो।
🎧 3- ''वला अन्तुम अअ्बिदूना मा अअ्बुदु'', और न तुम उसकी इबादत करोगे जिस एक अल्लाह की मैं इबादत करता हूँ।
🎧 4- ''वला अना अअ्बिदुम मा अ्बत्तुम'', और न मैं उन मूर्तियों की पूजा करुंगा जिनको तुम पूजते हो।
🎧 5- ''वला अन्तुम अअ्बिदूना मा अअ्बुदू'', और न तुम उसकी इबादत करोगे जिस एक अल्लाह की मैं इबादत करता हूँ।
🎧 6- ''लकुम दीनुकुम व लिया दीन'', तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है, जिसको तुमने अपने लिए गढ़ लिया है, और मेरे लिए मेरा धर्म है जिसको अल्लाह ने मुझपर उतारा है।

प्रश्न 13: सूरा अन-नस़्र पढ़ें और उसकी तफ़सीर करें?

उत्तर- सूरा अन-नस़्र और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
(हे नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं (मक्का) विजय आ जाए। और आप लोगों को अल्लाह के धर्म में झुंड के झुंड प्रवेश करते हुए देख लें। तो आप अपने रब की महिमा एवं प्रशंसा करने में लग जाएं और उससे क्षमा की प्रार्थना करें, निःसंदेह वह बड़ा क्षमा करने वाला है। [सूरा अन-नस़्र: 1-3]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''इज़ा जाआ नस़रुल्लाहि वलफ़त्हु'', हे नबी! जब तेरे दीन के लिए अल्लाह की मदद एवं शक्ति आ गई, और मक्का विजय हो गया।
🎧 2- ''व रऐतन्नासा यदख़ुलूना फ़ी दीनिल्लाहि अफ़वाजा'' और आप लोगों को झुंड पर झुंड अल्लाह के दीन में प्रवेश करते हुए देख रहे हैं।
🎧 3- ''फ़सब्बिह़ बिह़म्दि रब्बिका वस्तग़्फ़िरहु इन्नहू काना तव्वाबा'', तो जान लें कि यह उस मिशन की समाप्ति के क़रीब होने का संकेत है, जिसके साथ आप भेजे गए थे। अतः आप मदद और विजय की नेमत पर आभार प्रकट करते हुए, अपने पालनहार की पवित्रता और महिमा का गुणगान करें, और उससे क्षमा याचना करें। निश्चय वह बहुत तौबा क़बूल करने वाला है, अपने बंदों की तौबा क़बूल करता और उन्हें क्षमा कर देता है।

प्रश्न 14: सूरा अल-मसद पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-मसद और उसकी वयाख्या:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
"अबू लहब के दोनों हाथ नाश हो गए, और वह स्वयं भी नाश हो गया! उसका धन तथा जो उसने कमाया उसके काम न आया। वह शीघ्र लावा फेंकती आग में जाएगा। तथा उसकी पत्नी भी, जो ईंधन लिए फिरती है। उसकी गर्दन में मूँज की रस्सी होगी। [सूरा अल-मसद: 1-5]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''तब्बत यदा अबि लहबिंव वतब्बा'', नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चचा अबू लहब के दोनों हाथ उसके बुरे कार्य के कारण बर्बाद हो गए, इसलिए कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट देता था, तथा उसकी कोशिश अकारत गई।
🎧 2- ''मा अग़्ना अन्हु मालुहु वमा कसबा'', अर्थात उसका माल व धन उसके कोई काम न आया, न वह उससे अज़ाब को दूर कर पाया और न उसके लिए दया का कारण बन पाया।
🎧 3- ''सयस़ला नारन ज़ाता लहबिन'', वह क़यामत के दिन लपकते हुए शोले मे प्रवेश करेगा।
🎧 4- "'वम्,रअ्तुहू हम्मालतल हत़बा'', इस आग में उसकी पत्नी उम्मे जमील भी प्रवेश करेगी, इसलिए कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रास्ते में कांटे डालकर आपको कष्ट देती थी।
🎧 5- ''फ़ीजीदिहा हबलुम् मिम् मसदिन'', अर्थात उसके गले मे मोटी बटी हुई रस्सी होगी जिसके द्वारा वह आग की तरफ घसीटी जाएगी।

प्रश्न 15: सूरा अल-इख़लास़ पढ़ें और उसकी व्याख्या करें?

उत्तर- सूरा अल-इख़लास़ और उसकी व्याख्या:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
(आप कह दीजिए कि वह अल्लाह एक है। अल्लाह बेनियाज़ (निःस्पृह) है। न उस ने (किसी को) जना है, और न (किसी ने) उसको जना है। और न उसके बराबर कोई है)। [सूरा अल-इख़्लास़ 1-4]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''क़ुल हुवल्लाहु अह़द'', हे अल्लाह के रसूल! आप कह दें कि वही एक मात्र अल्लाह है, उसके अतिरिक्त कोई माबूद नहीं है।
🎧 2- ''अल्लाहुस़् स़मद'', अर्थात उसी के पास सृष्टियों की समस्याओं का समाधान है।
🎧 3- ''लम यलिद व लम यूलद'', जिसने न किसी को जन्म दिया है और न उसे किसी ने जन्म दिया है"। अतः पवित्र अल्लाह की न कोई संतान है और न माता-पिता।
🎧 4- ''व लम यकुल लहु कुफ़ुवन अह़दून'', अर्थात उसकी रचना में उसके जैसा कोई नहीं है।

प्रश्न 16: सूरा अल-फ़लक़ पढ़ें और उसकी तफ़सीर बयान करें?

उत्तर- सूरा अल-फ़लक़ और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
((ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं सुबह के रब की शरण में आता हूँ। उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की है। तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए। तथा गाँठ लगा कर उसमें फूँकने वालियों की बुराई से। तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे)। [सूरा अल-फ़लक़: 1-5]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''क़ुल अऊज़ु बिरब्बिल फ़लक़ि'', आप कह दें, हे रसूल! मैं स़ुबह के रब को मज़बूती के साथ पकड़ता हूँ एवं उसकी शरण में आता हूँ।
🎧 2- ''मिन शर्रि मा ख़लक'', उस चीज़ की बुराई से जो सृष्टियों को कष्ट पहुँचाए।
🎧 3- ''व मिन शर्रि ग़ासिक़िन इज़ा वक़ब'', मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ उस चीज़ की बुराई से जो रात में प्रकट होते हैं जैसे कि चौपाये, रेंगने वाले जीव या चोर।
🎧 4- ''व मिन शर्रिन् नफ़्फ़ास़ाति फ़िल उक़द'', और मैं अल्लाह की पनाह चाहता हूँ उन जादूगरनियों की बुराई से जो गांठों में फ़ूँकती हैं।
🎧 5- ''व मिन शर्रि ह़ासिदिन इज़ा हसद'', और मैं अल्लाह की शरण में आता हूँ हर ईर्ष्या, हसद एवं जलन करने वाले की बुराई से जब वह अल्लाह की दी हुई नेमतों पर लोगों से हसद करे, उनसे उनके ख़त्म हो जाने की कामना करे और उनके कष्ट में पड़ जाने की दुआ करे।

प्रश्न 17: सूरा अन-नास पढ़ें और उसकी तफ़सीर करें?

उत्तर- सूरा अन-नास और उसकी तफ़सीर:
अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
"(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं मनुष्यों के रब की शरण में आता हूँ। जो समस्त इन्सानों का स्वामी है। जो सारे लोगों का पूज्य है। भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले की बुराई से। जो लोगों के सीनों में भ्रम डालता है। जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी। [सूरा अन-नास: 1-6]
तफ़सीर (व्याख्या):
🎧 1- ''क़ुल अऊज़ु बिरब्बिन नासि'', आप कह दें, हे रसूल! मैं लोगों के रब को मज़बूती के साथ पकड़ता हूँ एवं उसकी शरण में आता हूँ।
🎧 2- ''मलिकिन नास'' अर्थातः वह लोगों का बादशाह है, वह उनके साथ जो चाहता है करता है। उसके सिवा उनका कोई बादशाह नहीं है।
🎧 3- ''इलाहिन नासि'', जो लोगों का सच्चा माबूद है, उसके अतिरिक्त उन लोगों का कोई सत्य पूज्य नहीं है।
🎧 4- ''मिन शर्रिल वसवासिल ख़न्नासि'', शैतान की बुराई से जो लोगों को भटकाते हैं।
🎧 5- ''अल्लज़ी युवसविसु फ़ी स़ुदूरिन नासि'', लोगों के दिलों में भ्रम डालते हैं।
🎧 6- ''मिनल जिन्नति वन्नासि'', अर्थात यह भ्रमित करने वाले इंसानों में से होते हैं एवं जिन्नों में से भी।

हदीस़ खंड14

प्रश्न 1: इस हदीस़ को पूर्ण करें ''इन्नमल आअ्मालु बिन्नियाति'' (सभी कार्यों का आधार निय्यतों पर है) फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- अमीरुल मोमिनीन (मोमिनों के सरदार) अबू हफ़्स उमर बिन ख़त्ताब -अल्लाह उनसे राज़ी हो- कहते हैं कि मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फरमाते हुए सुना है: सभी कार्यों का आधार निय्यतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी निय्यत (इरादा) के अनुरूप ही परिणाम मिलेगा। अतः,जिसकी हिजरत (पलायन) अल्लाह एवं उसके रसूल के लिए हो, तो उसकी हिजरत अल्लाह एवं उसके रसूल के लिए है। तथा जिसकी हिजरत दुनिया प्राप्त करने या किसी स्त्री से शादी रचाने के कारण हो, तो उसकी हिजरत उसी काम के लिए है, जिसके लिए उसने हिजरत की है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से निम्नांकित कुछ लाभ प्राप्त होते हैं:

1- कोई भी (धार्मिक) कार्य जैसे नमाज़, रोज़ा एवं हज्ज इत्यादि कार्यों के लिए निय्यत का होना ज़रूरी है।
2- निय्यत में इख़्लास़ एवं निष्ठा का होना आवश्यक है।
* दूसरी हदीस़:

प्रश्न 2: इस हदीस़ को पूरी करें ''मन अह़दस़ा फ़ी अमरिना हाज़ा'' (जिसने इस दीन में कोई नई बात पैदा की) फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- मोमिनों की माँ उम्मे अब्दुल्लाह आयशा -अल्लाह उनसे राज़ी हो- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: जिसने हमारे इस धर्म में कोई ऐसी चीज़ निकाली, जो धर्म का भाग नहीं है , तो वह मर्दूद (अस्वीकृत) है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से ये लाभ प्राप्त होते हैं:
1- धर्म में कोई नई बात पैदा करने की मनाही है।
2- नये कार्यों को ठुकरा दिया जाएगा तथा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
तीसरी हदीस़:

प्रश्न 3: इस हदीस़ को पूरी करें ''बैनमा नह़नु जुलूसुन इन्दा रसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम...'' (हम लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास बैठे हुए थे...) फिर इसके कुछ फायदों का उल्लेख करें!

उत्तर- उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैंः हम लोग एक दिन अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम) के पास बैठे हुए थे कि अचानक एक व्यक्ति प्रकट हुआ। उसके वस्त्र अत्यंत सफ़ेद एवं बाल बहुत काले थे। उसके शरीर पर यात्रा का कोई प्रभाव भी नहीं दिख रहा था और हम में से कोई उसे पहचान भी नहीं रहा था। वह अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने बैठ गया और अपने दोनों घुटने आपके घुटनों से मिला लिए, और अपनी दोनों हथेलियाँ अपने दोनों रानों पर रख लिया। फिर बोला: ऐ मुहम्मद! मुझे बताइए कि इस्लाम क्या है? आपने उत्तर दिया: ''इस्लाम यह है कि तुम इस बात की गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं तथा मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करो, ज़कात दो, रमज़ान के रोज़े रखो तथा यदि सामर्थ्य हो (अर्थात् सवारी और रास्ते का ख़र्च उपलब्ध हो) तो अल्लाह के घर काबा का हज करो''। उसने कहा: आपने सही बताया। उमर- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हमें आश्चर्य हुआ कि यह कैसा व्यक्ति है, जो पूछ भी रहा है और फिर स्वयं उसकी पुष्टि भी कर रहा है?! उसने फिर कहा: मुझे बताइए कि ईमान क्या है? आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: ''ईमान यह है कि तुम विश्वास रखो अल्लाह पर, उसके फरिश्तों, उसकी पुस्तकों, उसके रसूलों, और अंतिम दिन पर तथा तुम विश्वास रखो तक़दीर पर चाहे अच्छी हो या बुरी पर''। उस व्यक्ति ने कहा: आपने सही फ़रमाया। इसके बाद उसने कहा कि मुझे बताइएः एहसान किया है? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया: ''अल्लाह की वंदना इस तरह करो, जैसे तुम उसे देख रहे हो। यदि अल्लाह को देखने की कल्पना उत्पन्न न हो सके तो कम-से-कम यह सोचो कि वह तुम्हें देख रहा है''l उसने फिर पूछा: मुझे बताइए कि क़यामत कब आएगी? आपने फ़रमाया: ''जिससे प्रश्न किया गया है वह (इस विषय में) प्रश्न करने वाले से अधिक नहीं जानता''। उसने कहा: तो फिर मुझे क़यामत की निशानियाँ ही बता दीजिए? आपने कहाः ''क़यामत की निशानी यह है कि दासी अपने स्वामी को जन्म देने लगे, और नंगे पैर, नंगे बदन, निर्धन और बकरियों के चरवाहे, ऊँचे-ऊँचे महलों पर गर्व करने लगें''। (उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैंं कि) फिर वह व्यक्ति चला गया। कुछ समय बीतने के पश्चात अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पूछाः ''ऐ उमर! क्या तुम जानते हो, यह सवाल करने वाला व्यक्ति कौन था''? मैंने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ही भली-भाँति जानते हैं। तो आपने फरमायाः ''यह जिबरील (अलैहिस्सलाम) थे, जो तुम्हें तुम्हारा धर्म सिखाने आए थे''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से ये निष्कर्ष निकलते हैंः
1-इस्लाम के पाँच अरकान अर्थात स्तंभों का उल्लेख, और वह ये हैं:
ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा माबूद नहीं है एवं मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं) की गवाही देना।
नमाज़ क़ायम करना,
ज़कात देना,
रमज़ान महीना के रोज़े रखना
और अल्लाह के हुरमत वाले घर (काबा) का हज्ज करना।
2- इस हदीस़ में ईमान के स्तंभों को भी बयान किया गया है, और वह छह हैं:
अल्लाह पर ईमान,
उसके फ़रिश्तों पर ईमान,
उसकी पुस्तकों पर ईमान,
उसके रसूलों पर ईमान,
आख़िरत के दिन पर ईमान
एवं अच्छी बुरी तक़दीर पर ईमान।
3- एहसान के स्तंभ का भी बयान है, और वह एक है, जिसका सारांश यह है कि आप अल्लाह की उपासना इस प्रकार करें कि मानो आप उस को देख रहे हैं, यदि यह कल्पना न उत्पन्न हो सके कि आप उसको देख रहे हैं तो (यह स्मरण रखें कि) वह आपको अवश्य देख रहा है।
4- क़यामत कब आएगी, इसके बारे में अल्लाह के अलावा कोई नहीं जानता है।
चौथी हदीस़:

प्रश्न 4: इस हदीस़ को पूरी करें ''अक्मलुल मोमिनीना ईमानन...'' फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "सबसे संपूर्ण ईमान वाला मोमिन वह है, जो उनमें सबसे अच्छे व्यवहार का मालिक है"। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है, तथा तिर्मिज़ी कहते हैं: यह हदीस हसन सहीह है।
इस ह़दीस से ये लाभ प्राप्त होते हैं।
1- लोगों को अच्छे व्यवहार के प्रति प्रोत्साहित करना।
2- श्रेष्ठ व्यवहार श्रेष्ठ ईमान में से है।
3- ईमान घटता बढ़ता है।
* पाँचवीं हदीस़:

प्रश्न 5: इस हदीस़ को पूरी करें ''मन हलफ़ा बिग़ैरिल्लाहि...'' फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: जो अल्लाह के सिवा किसी और वस्तु की सौगंध खाता है, वह शिर्क अथवा कुफ़्र करता है''। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से हमें मालूम होता है।
1- अल्लाह के सिवा किसी अन्य की क़सम खाना जायज़ नहीं है।
2- अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की क़सम खाना छोटा शिर्क है।
* छठी हदीस़:

प्रश्न 6: इस हदीस़ को पूरी करें ''ला युअ्मिनु अहदुकुम हत्ता अकूना अहब्बा इलैहि...'' फिर इससे निकले कुछ अर्थों के बारे में बताएं!

उत्तर- अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: तुम में से कोई उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक मैं उसके निकट, उसकी संतान, उसके पिता और तमाम लोगों से अधिक प्रिय न हो जाऊँ''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से चयनित कुछ लाभ निम्न हैंः
1- किसी भी आदमी से अधिक नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रेम करना वाजिब व अनिवार्य है।
2- यह ईमान के मुकम्मल होने के लिए ज़रूरी है।
* सातवीं हदीस़:

प्रश्न 7: इस हदीस़ को पूरी करें ''ला युअ्मिनु अहदुकुम हत्ता युहिब्बा लिअख़ीहि...'' फिर इससे निकले कुछ अर्थों के बारे में बताएं!

उत्तर- अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: तुममें से कोई उस समय तक मोमिन नहीं हो सकता, जब तक वह अपने भाई के लिए वही पसंद न करे, जो अपने लिए पसंद करता है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से चयनित कुछ लाभ निम्न हैंः
1- मोमिन पर वाजिब है कि वह अपने दूसरे मोमिन भाइयों के लिए वही पसंद करे जो अपने लिए पसंद करता है।
2- यह ईमान के मुकम्मल होने के लिए ज़रूरी है।
* आठवीं हदीस़:

प्रश्न 8: इस हदीस़ को पूरी करें ''वल्लज़ी नफ़सी बियदिही!'' फिर बताएं कि इस हदीस़ का सारभूत अर्थ क्या है?

उत्तर- अबू सईद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: क़सम उस अल्लाह की जिसके हाथ में मेरी जान है, यह (सूरा इख़्लास़) एक तिहाई क़ुरआन के बराबर है''। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से चयनित कुछ लाभ निम्न हैंः
1- इस हदीस़ से सूरा इख़्लास़ का महत्व मालूम होता है।
2- यह सूरा एक तिहाई क़ुरआन के बराबर है।
नवीं हदीस़:

प्रश्न 9: इस हदीस़ को पूरी करें ''ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि'' फिर बताएं कि इस हदीस़ का निष्कर्ष क्या है?

उत्तर- अबू मूसा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि, जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाना है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से चयनित कुछ लाभ निम्न हैंः
1- इन शब्दों का महत्व, कि यह जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाना है।
2- ये शब्द बन्दा को उसकी ताक़त और क़ुव्वत से निकालकर केवल एक अल्लाह पर विश्वास एवं भरोसा करने को कहते हैं।
* दसवीं हदीस़:

प्रश्न 10: इस हदीस़ को पूर्ण करें ''अला फ़िल जसदि मुज़ग़तुन'' (सचेत रहो, शरीर के अंदर एक टुकड़ा है) फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- नुअ्मान बिन बशीर -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैं ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को फ़रमाते हुए सुना है: ख़बरदार हो जाओ! जिस्म के अंदर एक टुकड़ा है, यदि वह सही रहे तो सारा जिस्म सही रहता है, और यदि वह बिगड़ जाए तो सारा जिस्म बिगड़ जाता है, और वह दिल है''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से ये निष्कर्ष निकलते हैं।
1- जिस्म के अंदर व बाहर का सही होना दिल के सही होने पर निर्भर है।
2- दिल के सही होने का ख़याल रखना चाहिए क्योंकि इसी पर इंसान का सही होना निर्भर है।
ग्यारहवीं हदीस़:

प्रश्न 11: इस हदीस़ को पूरी करें ''मन काना आख़िरु कलामिहि मिनद् दुनिया ला इलाहा इल्लल्लाहु'' (दुनिया से विदा लेते समय जिसका अंतिम कलाम ला इलाहा इल्लल्लाहु हो) फिर इसके कुछ फायदों के बारे में भी बताएं!

उत्तर- मुआज़ बिन जबल -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: "जिसकी ज़बान से निकलने वाले अंतिम शब्द ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' होंगे, वह जन्नत में प्रवेश करेगा"। इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से निकलने वाले कुछ निष्कर्ष इस प्रकार हैं।
1- ''ला इलाहा इल्लल्लाहु'' की श्रेष्ठता, कि बन्दा उसके द्वारा जन्नत में जाएगा।
2- जिसकी ज़बान से निकलने वाला आख़री शब्द ''ला इलाहा इल्लल्लाह'' हो, उसका प्रतिफल।
* बारहवीं हदीस़:

प्रश्न 12: इस हदीस़ को पूरी करें ''लैसल मुअ्मिनु बित़़्त़अ्आनि व लल्लअ्आनि'' (मोमिन ताना देने वाला एवं लानत करने वाला नहीं होता है), फिर इसके कुछ फायदों के बारे में बताएं!

उत्तर- अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: मोमिन ताना देने वाला, लानत करने वाला, बदज़ुबान और फ़िजूल बकने वाला नहीं होता है। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से ये निष्कर्ष निकलते हैं।
1- सभी प्रकार के झूठ, अनर्गल एवं निरर्थक बातों की वर्जना।
2- ज़ुबान की रक्षा मोमिन का गुण है।
तेरहवीं हदीस़:

प्रश्न 13: इस हदीस़ को पूरी करें ''मिन हुस्नि इस्लामिल मरइ...'' फिर इसके कुछ फायदों के बारे में बताएं!

उत्तर- अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: आदमी के इस्लाम की सुन्दरता यह है कि वह फ़िजूल की बातों को छोड़ दें''। इस हदीस़ को तिरमिज़ी आदि ने रिवायत की है।
इस ह़दीस से ये निष्कर्ष निकलते हैं।
1- जिन बातों से दीन व दुनिया का कोई लाभ न मिलता हो, उन्हें छोड़ देना चाहिए।
2- फ़िजूल की बातों को छोड़ देना ही मनुष्य के इस्लाम का कमाल है।
चौदहवीं हदीस़:

प्रश्न 14: इस हदीस़ को पूरी करें ''मन क़,र,अ हरफ़म मिन किताबिल्लाहि...'' फिर इसके कुछ फायदों के बारे में बताएं!

उत्तर- अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "जिसने अल्लाह की किताब का एक अक्षर पढ़ा, उसके बदले में उसे एक नेकी मिलेगी और अल्लाह के यहाँ एक नेकी का बदला दस गुणा मिलता है। मैं यह नहीं कहता कि अलिफ़, लाम, मीम एक अक्षर है। बल्कि अलिफ़ एक अक्षर है, लाम एक अक्षर है और मीम एक अक्षर है"। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
इस ह़दीस से चयनित कुछ लाभ निम्न हैंः
1- क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत (पढने) का प्रतिफल।
2- हर अक्षर जो आप पढ़ेंगे, उसके बदले बहुत सारी नेकियाँ हैं।

इस्लामी अदब (शिष्टाचार) खंड26

प्रश्न 1: अल्लाह तआला के प्रति हमारा रवैया कैसा हो?

उत्तर- 1- पाक अल्लाह के साथ हमारा रवैया सम्मान का हो,
2- केवल उसी की इबादत करें और उसके साथ किसी को शरीक न करें।
3- उसका आज्ञापालन करें।
4- उसकी अवज्ञा न करें।
5- उसके अनगिनत उपकारों एवं नेमतों पर शुक्र अदा करें, उसकी प्रशंसा करें।
6- उसके लिखे हुए भाग्य पर धैर्य रखें।

प्रश्न 2: रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रति हमारा रवैया कैसा हो?

उत्तर-1- उनका अनुपालन एवं पैरवी करना।
2- उनका आज्ञापालन करना।
3- उनकी अवज्ञा न करना।
4- उनकी दी गई ख़बरों को सच मानना।
5- उनकी सुन्नत में वृद्धि कर के बिद्अत (नवाचार) न अंजाम देना।
6- उनसे अपनी जान या किसी और व्यक्ति से अधिक मुहब्बत करना।
7- उनका सम्मान करना, उनकी एवं उनकी सुन्नत की मदद करना।

प्रश्न 3: माता-पिता के साथ हमारा क्या रवैया हो?

उत्तर- 1- गुनाह के अलावा के काम में उनका अनुपालन करना।
2- माता-पिता की सेवा करना।
3- माता-पिता की मदद करना।
4- माता-पिता की ज़रूरतें पूरी करना।
5- माता-पिता के लिए दुआ करना।
6- उनसे बात करने में अच्छा रवैया अपनाना, उन्हें ''उफ़्फ़'' तक न कहना।
7- माता-पिता के सामने मुस्कुराना, न कि मुंह बनाना।
8- माता-पिता की आवाज़ से ऊँची अपनी आवाज़ न रखें, उन्हें ध्यान से सुनें, उनकी बात न काटें, उनको उनके नाम से न पुकारें, बल्कि उन्हें ''अब्बू'' या ''अम्मी'' कहकर पुकारें।
9- जब वे दोनों अपने कमरे में हों तो उनकी अनुमति के बाद ही उनके पास आएं।
10- माता-पिता के हाथ एवं सर चूमें।

प्रश्न 4: हम रिश्तेदारी कैसे निभाएं?

उत्तर- 1- कभी कभी निकट के रिश्तेदारों जैसे भाई, बहन, चचा, चची, मामू, मौसी एवं दूसरे रिश्तेदारों के घर जाना।
2- बात, काम एवं उनकी मदद के द्वारा उनपर उपकार करना।
3- इसी तरह उनके संपर्क में रहना एवं उनकी परिस्थितियों के बारे में सवाल करते रहना।

प्रश्न 5: हम अपने भाइयों एवं दोस्तों के साथ कैसे रहें?

उत्तर- 1-अच्छे लोगों से मुहब्बत करें और उनके साथ रहें।
2- बुरे लोगों का साथ छोड़ दें एवं उनसे बचें।
3- अपने भाइयों को सलाम करें एवं उनसे हाथ मिलाएं।
4- जब वो बीमार हों तो उनको देखने जाएं एवं उनके स्वस्थ होने की दुआ करें।
5- उनके छींकने का जवाब दें।
6- जब मुस्लिम भाई भेंट करने बुलाए तो उसकी दावत को क़बूल करें।
7- उसे सही रास्ता दिखाएं।
8- जब वह अत्याचार करे तो उसकी मदद करें, वह इस तरह कि उसे अत्याचार करने से रोकें।
10- अपने मुस्लिम भाई के लिए वही पसंद करें जो अपने लिए पसंद करते हैं।
11- उसकी मदद करें जब उसे हमारी मदद की ज़रूरत हो।
12- अपनी ज़ुबान या हरकत के द्वारा उन्हें नुक़सान न पहुँचाएं।
13- उसके भेद की हिफ़ाज़त करें।
14- न उसको गाली दें, न उसकी ग़ीबत करें, न उससे नफ़रत करें, न उससे हसद करें, न उसके पीछे पड़ें और न उसको धोखा दें।

प्रश्न 6: पड़ोस में रहने के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- अपनी बात एवं हरकत से पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करें, और जब उसे मदद की आवश्यकता हो तो उसकी मदद करें।
2- ईद तथा विवाह आदि के अवसरों पर उनको बधाई पेश करें।
3- जब वह बीमार हो तो उसकी अयादत (रोगी का हाल पूछने) के लिए जाएं, जब उसके यहां मौत हो तो उसके साथ संवेदना व्यक्त करें।
4- जहां तक संभव हो, जो हमारे यहां खाना पके, उसे भी भेजवाएं।
5- अपनी बात या हरकत से उसे कष्ट न दें।
6- बुलंद आवाज़ से उसे परेशान न करें, उसकी जासूसी न करें और उसकी किसी अनैतिक बात या हरकत पर धैर्य रखें।

प्रश्न 7: निमंत्रण और अतिथि के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- यदि कोई निमंत्रण दे, तो उसे स्वीकार करें।
2- यदि किसी के घर जाना चाहते हैं तो उससे अनुमति लें और समय ले लें।
3- उसके घर में प्रवेश करने से पहले अनुमति लें।
4- उसके घर जाने में देर न करें।
5- घर की औरतों से नज़र नीची रखें।
6- अतिथि का मुस्कुराते हुए एवं अच्छे शब्दों के साथ सबसे अच्छा स्वागत करें।
7- अतिथि को सबसे अच्छी जगह में बैठाएं।
8- खाने एवं पीने की चीज़ों के साथ अतिथि का सम्मान करें।

प्रश्न 8: बीमारी एवं अयादत (बीमार पुर्सी, रोगी का हाल-चाल पूछना) के आदाब का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- जब किसी जगह दर्द का अनुभव करें तो अपना दायां हाथ वहाँ रखें और तीन बार ''बिस्मिल्लाह'' कहें, फिर सात बार ''अऊज़ु बिइज़्ज़तिल्लाहि व क़ुदरतिहि मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु'' (मैं अल्लाह तआला की ताक़त एवं शक्ति की शरण में आता हूँ उस तकलीफ़ से जो मैं अभी महसूस कर रहा हूं और जिसके कारण भविष्य में मैं कठिनाइयों का सामना करने वाला हूँ) कहें।
2- अल्लाह द्वारा लिखित भाग्य से राज़ी हों एवं धैर्य रखें।
3- अपने बीमार भाई को देखने जाने में जल्दी करें, उसके लिए दुआ करें और वहां बहुत लंबा न बैठें।
4- वह फूंकने को न कहे फिर भी दुआ पढ़कर फूंकें।
5- उसे नस़ीहत करें कि वह हर संभव धैर्य, दुआ, नमाज़ एवं पवित्रता का ख़याल रखे।
6- बीमार के लिए सात बार यह दुआ पढ़ें ''अस्अलुल्लाहल अज़ीमा, रब्बल अर्शिल अज़ीमि अंय् यशफ़ियका'' (मैं बहुत बड़े अर्श के रब महान अल्लाह से दुआ करता हूँ कि वह आपको ठीक कर दे)।

प्रश्न 9: ज्ञान प्राप्त करने के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- महान एवं उच्च अल्लाह के लिए इरादा को शुद्ध करना एवं निष्ठावान होना।
2- जो ज्ञान प्राप्त किया है उस पर अमल करना।
3- अपने शिक्षक का, उनकी उपस्थिति में या अनुपस्थिति में, सम्मान करना।
4- उनके सामने अदब के साथ बैठना।
5- उनको ध्यान पूर्वक सुनना एवं पाठ के बीच में बाधा न पहुँचाना।
6- प्रश्न करते समय शिष्टाचार का ध्यान रखना।
7- उनको उनके नाम से न बुलाना।

प्रश्न 10: सभा के आदाब क्या हैं?

उत्तर- 1- सभा में बैठे हुए लोगों को सलाम करें।
2- जहां बैठने की जगह मिले वहीं बैठ जाएं, न किसी को उसके स्थान से उठाएं और न बिना अनुमति के दो लोगों के बीच बैठें।
3- दूसरों को भी बैठने की जगह दें।
4- मजलिस में किसी की बात न काटें।
5- सभा से निकलने से पहले अनुमति लें एवं सलाम करके जाएं।
6- जब सभा समाप्त हो तो सभा के अंत में सभा के पापों को मिटाने वाली यह दुआ पढ़ेंः "سُبْحانَكَ اللَّهُمَّ وبِحَمْدِكَ، أشْهَدُ أنْ لا إلهَ إِلاَّ أنْتَ، أسْتَغْفِرُكَ وأتُوبُ إِلَيْكَ" सुब्ह़ानक् अल्लाहुम्मा व बिह़म्दिका, अश्हदु अल्ला इलाहा इल्ला अन्त, अस्तग़फ़िरुका व अतूबु इलैका (ऐ अल्लाह, तू पाक है और तेरी ही प्रशंसा है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है। मैं तुझसे क्षमा माँगता हूँ और तेरी ओर लौट कर आता हूँ।)

प्रश्न 11:सोने के आदाब क्या हैं?

उत्तर- 1- जल्दी सोएं।
2- पवित्र होकर सोएं।
3- पेट के बल न सोएं।
4- दायाँ करवट सोएं एवं अपना दायाँ हाथ अपने दाएँ गाल के नीचे रखें।
5- बिस्तर झाड़कर सोएं।
6- सोने की दुआएं पढ़कर सोएं जैसे कि आयतुल कुर्सी, सूरा इख़्लास़, सूरा फ़लक़ एवं सूरा नास। तीन तीन बार और यह कहें: "बिस्मिका अल्लाहुम्मा अमूतु व अह़या'' (ऐ अल्लाह! मैं तेरे ही नाम से मरता और जीता हूँ)।
7- फ़ज्र की नमाज़ के लिए जागें।
8- नींद से जागने के बाद कहें: "अलहम्दु लिल्लाहिल् लज़ी अह्याना बअ्द मा अमातना व इलैहिन नुशूर'' (सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें मृत्यु के पश्चात जीवन दिया और उसी की ओर लौटकर जाना है)

प्रश्न 12: खाना खाने के क्या आदाब हैं?

उत्तर-
1- महान एवं उच्च अल्लाह के आज्ञाओं के पालन हेतु शक्ति प्राप्त करने की निय्यत करते हुए भोजन करना।
2- फिर खाने से पूर्व दोनों हाथों को धोना।
3- ''बिस्मिल्लाह'' कहना, दाहिने हाथ से खाना, अपने क़रीब की तरफ से खाना, बर्तन के बीच से या जो दूसरे की तरफ हो, उससे न खाना।
4- यदि आरंभ में ''बिस्मिल्लाह'' भूल जाए तो जब याद आए तब कहे ''बिस्मिल्लाहि अव्वलहू व आख़िरहू''।
5- जो खाना उपस्थित हो उसी पर संतोष करना, खाने में दोष न निकालना, यदि पसंद आए तो खा लेना और यदि नापसंद हो तो छोड़ देना।
6- कुछ लुक़मे खाना, अत्यधिक न खाना।
7- खाने एवं पीने की चीज़ों में न फूंक मारना और न ही उसे इतनी देर तक छोड़ना कि ठंडा हो जाए।
8- अपने परिवार के लोगों एवं दोस्तों के साथ मिलकर भोजन करना।
9- अपने बड़ों से पहले खाना शुरू न करना।
10- पानी पीते समय अल्लाह का नाम लेना, बैठकर पानी पीना एवं तीन सांसों में पीना।
11- खाना समाप्त करने के बाद अल्लाह की प्रशंसा बयान करना।

प्रश्न 13: कपड़ा पहनने केआदाब गिनाओ?

उत्तर- 1- दायीं ओर से कपड़ा पहनना आरंभ करें और उस पहनावा के उपलब्ध कराने पर अल्लाह की प्रशंसा करें।
2- टखना के नीचे तक कपड़ा न रखें।
3- न बच्चे बच्चियों के, और न ही बच्चियाँ बच्चों के कपड़े पहनें।
4- कपड़े काफ़िरों के कपड़ों एवं लफंगों के कपड़ों की तरह न हों।
5- कपड़ा उतारते समय बिस्मिल्लाह पढ़ें।
6- जूता, चप्पल सबसे पहले दाएं पैर में पहनें फिर बाएं पैर में।

प्रश्न 14: सवारी के आदाब का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- कहें: ''बिस्मिल्लाहि, अल्हम्दुलिल्लाहि'' (शुरू अल्लाह के नाम से एवं सारी प्रशंसा अल्लाह की है)। सुब्हानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा वमा कुन्ना लहू मुक़रिनीन... (पवित्र है वह, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया, अन्यथा हम इसे अपने वश में नहीं कर सकते थे...), व इन्ना इला रब्बिना ल,मुन्क़लिबून'' तथा हम अवश्य ही अपने रब की ओर फिरकर जाने वाले हैं)। [सूरा अल-ज़ुख़रुफ़: 13,14]
2- जब किसी मुसलमान के पास से होकर गुज़रें तो उसे सलाम करें।

प्रश्न 15: रास्ता के आदाब का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- अपनी चाल में नरमी एवं विनम्रता चुनें, तथा रास्ता के बायीं ओर से चलें।
2- जिससे मुलाक़ात हो, उसे सलाम करें।
3- अपनी नज़र नीची रखें एवं किसी को कष्ट न दें।
4- भलाई का आदेश दें और बुराई से मना करें।
5- रास्ते से कष्टदायक चीज़ों को हटाएं।

प्रश्न 16: घर में दाख़िल होने तथा उससे निकलने के आदाब का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- घर से निकलते समय अपना बायाँ पैर निकालें और कहें: "बिस्मिल्लाहि, तवक्कलतु अलल्लाहि, ला ह़ौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका, अन अज़िल्ला औ उज़ल्ला, औ अज़िल्ला औ उज़ल्ला, औ अज़लिमा औ उज़लमा, औ अजहला औ युजहला अलैया", अर्थातः "अल्लाह के नाम से (चलना शुरू करता हूँ), मैंने अल्लाह पर पूरा भरोसा कर लिया, अल्लाह के सिवा कोई न बुराई से फेर सकता है और न ही नेकी के करने की शक्ति दे सकता है, ऐ अल्लाह! मैं इस बात से तेरी पनाह माँगता हूँ कि गुमराह हो जाऊँ या गुमराह कर दिया जाऊँ, या फिसल जाऊँ या फिर फिसला दिया जाऊँ, या किसी पर ज़ुल्म करूँ या मुझपर ज़ुल्म किया जाए, या मैं जाहिलों जैसा काम करूँ या मेरे साथ जाहिलों वाला काम किया जाए"। 2- घर में प्रवेश करते समय दाहिना पैर पहले दाखिल करें और कहें: बिस्मिल्लाहि वलजना, व बिस्मिल्लाहि ख़रजना, व अला रब्बिना तवक्कलना'', (अल्लाह के नाम से घर में घुसे, अल्लाह के नाम से घर से निकले और हम ने अपने रब पर ही भरोसा किया''।
3- मिसवाक (दतवन)
करें फिर घर वालों को सलाम करें।

प्रश्न 17: पेशाब-पाखाना के आदाब का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- शौचालय में प्रवेश करते समय बायाँ पैर पहले रखें।
2- प्रवेश करने से पूर्व कहें: "बिस्मिल्लाहि, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ुबिका मिनल ख़ुबुस़ि वल ख़बाइस़ि'' (अल्लाह के नाम से, ऐ अल्लाह! मैं नापाक जिन्नों एवं नापाक जिन्नियों से तेरी शरण माँगता हूँ)।
3- अपने साथ ऐसा कुछ न ले जाएं जिसमें अल्लाह का ज़िक्र हो।
4- शौच करते समय पर्दा करें।
5- पाखाना करते समय किसी से बात न करें।
6- पाखाना-पेशाब करते समय काबा रुख होकर या उसको पीछे की ओर करके न बैठें।
7- गंदगी दूर करते समय बाएं हाथ का प्रयोग करें, दाएं हाथ का नहीं।
8- लोगों के रास्ते में या छायादार वृक्ष के नीचे पाखाना न करें।
9- पाखाना करने के बाद अपना हाथ धोएं।
10- पहले दायाँ पैर निकालें और कहें ''ग़ुफ़रानका'' (हे अल्लाह! मैं तेरी ही क्षमा चाहता हूँ)।

प्रश्न 18: मस्जिद के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- अपने दायाँ पैर को पहले मस्जिद में रखें और कहें: बिस्मिल्लाहि, अल्लाहुम्म्, इफ्तह ली अबवाब रहमतिका'' (शुरू अल्लाह के नाम से, हे अल्लाह! मेरे लिए तू अपनी रहमत का दरवाज़ा खोल दे)।
2- दो रक्अत नमाज़ पढ़ने से पहले न बैठें।
3- नमाज़ियों के आगे से न गुज़रें, या गुमशुदा चीज़ों का एलान मस्जिद में न करें, या मस्जिद में खरीद-बिक्री न करें।
4- मस्जिद से निकलते समय बायाँ पैर पहले निकालें और कहें: अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका मिन फ़ज़लिका'', (ऐ अल्लाह! मैं तुझ से तेरी कृपा का प्रश्न करता हूँ)।

प्रश्न 19: सलाम के आदाब बताएं?

उत्तर- 1- जब किसी मुसलमान से भेंट हो तो पहले सलाम करें, इस तरह: ''अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू'', इसके अतिरिक्त कोई दूसरा सलाम नहीं और न ही केवल हाथ हिलाएं।
2- सलाम करें तो मुस्कुरा कर सलाम करें।
3- अपने दाएं हाथ से मुस़ाफ़ह़ा करें (हाथ मिलाएं)।
4- जो कोई आप को सलाम करे तो उसको उससे अच्छा जवाब दें, या कम से कम उस तरह ही दें।
5- काफ़िर को पहले सलाम न करें, जब वह सलाम करे तो वैसा ही उसका जवाब दें।
6- छोटे बड़े को, सवार पैदल चलने वाले को, पैदल चलने वाला बैठे व्यक्ति को और कम लोग ज़्यादा लोगों को सलाम करें।

प्रश्न 20: अनुमति माँगने का क्या तरीक़ा है?

उत्तर- 1-किसी भी स्थान में प्रवेश करने से पहले अनुमति लें।
2- तीन बार अनुमति लें, उससे अधिक नहीं, उसके बाद (यदि अनुमति न मिले तो) लौट जाएं।
3- नम्रता के साथ दरवाज़ा खटखटाएं, दरवाज़ा के सामने न खड़े हों, बल्कि उसके दाएं या बाएं खड़े हों।
4- अपनी माँ या बाप या किसी और के पास उसके कमरे में अनुमति के बिना न आएं, विशेषकर फ़ज्र से पहले, ज़ुह्र के बाद आराम के समय तथा इशा के बाद।
5- हम आबादी रहित स्थानों में बिना अनुमति के प्रवेश कर सकते हैं, जैसे अस्पताल, बाज़ार आदि।

प्रश्न 21: जानवर पर दया करने के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- जानवर को खाना दें एवं उसे पानी पिलाएं।
2- जानवर के साथ नम्रता एवं दया का व्यवहार करें, एवं उस पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ न डालें।
3- जानवर को किसी प्रकार का कोई कष्ट न दें।

प्रश्न 22: खेलने-कूदने के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- अल्लाह के आज्ञापालन एवं उसको प्रसन्न करने वाले कार्य को अंजाम देने के लिए चुस्त रहने के इरादा से व्यायाम करें।
2- नमाज़ के समय न खेलें।
3- बच्चे, बच्चियों के साथ न खेलें।
4- खेलने के लिए ऐसे लिबास का चयन करें जो पर्दे के स्थानों को छुपा ले।
5- हराम खेल न खेलें, जैसे कि चेहरा पर मारने वाला खेल या जिसमें पर्दा न रहता हो।

प्रश्न 23: मज़ाक़ करने के कुछ आदाब बताएं?

उत्तर- 1- हंसी मज़ाक़ भी सच्चा होना चाहिए, झूठा नहीं।
2- हास्य परिहास, गलत बयानी, गाली-गलौज, कष्ट और धमकी से मुक्त होना चाहिए।
3- यह अधिक नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 24: छींकने के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- छींकते समय हाथ या कपड़ा या रूमाल मुँह पर रखें।
2- छींकने के बाद ''अल्हम्दुलिल्लाह'' (सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए) कहें।
3- उसका भाई या जो उसके साथ है वह ''यरहमुकल्लाह'' (अल्लाह आप पर रहम करे) कहे।
4- यह सुनकर छींकने वाला फिर ''यहदीकुमुल्लाहु व युस़लिहु बालकुम'' कहेगा, अर्थात अल्लाह आपको सुपथ दिखाए एवं आपके मामला को सही करे।

प्रश्न 25: जम्हाई के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- जम्हाई को रोकने की कोशिश करें।
2- यदि न रोक सकें तो कम से कम ''आआआह, आआआह'' की आवाज़ न निकालें।
3- अपने हाथ को अपने मुंह पर रखें।

प्रश्न 25: पवित्र क़ुरआन की तिलावत के क्या आदाब हैं?

उत्तर- 1- तिलावत वुज़ू के बाद पवित्र स्थिति में करें।
2- अदब एवं शांति के साथ बैठें।
3- तिलावत से पहले शैतान से अल्लाह की शरण माँगें।
क़ुरआन को सोच समझकर पढ़ें।

नैतिकता खंड30

प्रश्न 1: अच्छे आचरण का क्या महत्व है?

उत्तर- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया है: "सबसे संपूर्ण ईमान वाला मोमिन वह है, जो उनमें सबसे अच्छे व्यवहार का मालिक है"। इसे तिरमिज़ी एवं अहमद ने रिवायत किया है।

प्रश्न 2: हमें इस्लामी आचरण को क्यों अपनाना चाहिए?

उत्तर- 1- क्योंकि यह अल्लाह से मुहब्बत का कारण है।
2- यह सृष्टि से मुहब्बत का कारण है।
3- यह (क़यामत के दिन) तराज़ू में सबसे भारी चीज़ है।
4- अच्छे आचरण से नेकी एवं प्रतिफल कई गुना बढ़ जाता है।
5- यह ईमान के संपूर्ण होने की निशानी है।

प्रश्न 3: हमें अच्छे आचरण की शिक्षा कहां से लेनी चाहिए?

उत्तर- 1- पवित्र क़ुरआन से, महान अल्लाह ने कहा है: (إِنَّ هَذَا الْقُرْآَنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ) "निस्संदेह यह कुरआन वह रास्ता दिखाता है जो बहुत ही सीधा है"। [सूरा अल-इस्रा: 9] 2- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत से, जैसा कि आपने फरमाया है: निश्चित रूप से मुझे अच्छे आचरण को पूर्ण रूप देने हेतु भेजा गया है''। इसे अह़मद ने रिवायत किया है।

प्रश्न 4: एहसान क्या है और उसके क्या क्या रूप हैं?

उत्तर- एहसानः सदा यह ध्यान रखना है कि अल्लाह हमारी निगरानी कर रहा है, तथा सृष्टियों की भलाई एवं उनपर उपकार करने में लगे रहना है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है:
अल्लाह ने भलाई को हर एक चीज़ पर लिख दिया है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
एहसान के रूप:
- महान अल्लाह की इबादत में एहसान, और वह है उसकी इबादत में मुख़्लिस़ तथा निष्ठावान होना।
- माता-पिता के साथ कथन एवं कर्म के द्वारा एहसान।
- रिश्तेदारों एवं सगे-संबंधियों पर एहसान।
- पड़ोसी पर एहसान।
- अनाथों एवं ग़रीबों पर एहसान।
- आपके साथ बुरा करने वाले पर एहसान।
- बात के द्वारा एहसान।
- बहस व चर्चा में एहसान।
- जानवर पर एहसान।

प्रश्न 5: एहसान का विलोम क्या है?

उत्तर- एहसान का उल्टा बुरा करना है।
* उन्ही में से है:
महान अल्लाह की इबादत में निष्ठा को त्याग देना।
* माता-पिता की अवज्ञा।
*रिश्तेदारों से संबंध तोड़ना।
* पड़ोसियों के साथ बदसुलूकी (दुर्व्यवहार) करना:
* फ़कीरों एवं ग़रीबों के ऊपर एहसान करना बंद कर देना, बुरी बातों या बुरी हरकतों के द्वारा।

प्रश्न 6: अमानत (धरोहर) के कितने प्रकार हैं?

उत्तर-
1- अल्लाह तआला के अधिकारों की सुरक्षा करने की अमानत:
इसके कुछ रूप ये हैं: इबादतें जैसे नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज्ज इत्यादि, जिन्हें अल्लाह ने हम पर फ़र्ज़ किया है, उनको अदा करने में अमानत का ध्यान रखना।
2- बंदा के अधिकारों की सुरक्षा में अमानत:
* लोगों के सम्मान की सुरक्षा।
* उनके मालों की सुरक्षा।
* उनकी जानों की सुरक्षा।
* उनके भेदों एवं हर वह चीज़ जो वे आपके पास अमानत के तौर पर रखें, उनकी सुरक्षा।
अल्लाह तआला ने सफल होने वालों के गुणों का उल्लेख करते हुए कहा है:
(وَالَّذِينَ هُمْ لِأَمَانَاتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَاعُونَ) ''और जो अपनी अमानतों की सुरक्षा तथा वचन का पालन करने वाले हैं''। [सूरा अल-मोमिनून: 8]

प्रश्न 7: अमानत का विलोम क्या है?

उत्तर- ख़यानत, और वह अल्लाह के अधिकारों एवं लोगों के अधिकारों को बर्बाद कर देना है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
मुनाफ़िक़ (पाखंडी) की तीन निशानियाँ हैं'' -उनमें से एक यह बताया कि- ''जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे''। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 8: सच किसे कहते हैं?

उत्तर- बिल्कुल वास्तविकता के अनुरूप ख़बर देने या जैसा है वैसा ही बताने को सच कहा जाता है।
उसके कुछ रूप ये हैं:

* लोगों के साथ बात करने में सच कहना।
* वचन निभाना।
* हर बात व काम में सच्चा होना।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: सच्चाई नेकी की ओर ले जाती है, और नेकी जन्नत की ओर, और आदमी हमेशा सच बोलता रहता है यहां तक कि वह सच्चा बोलने वाला ही बन जाता है''। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 9: सच का विलोम क्या है?

उत्तर- झूठ, जो वास्तविकता के विपरीत हो, उन्हीं में से लोगों के साथ झूठ बोलना, वचन न निभाना तथा झूठी गवाही देना है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है:
"झूठ पाप का और पाप जहन्नम का मार्ग दिखाता है। एक इंसान, झूठ बोलता रहता है और झूठ को जीता रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह के पास 'झूठा' लिख दिया जाता है"। बुख़ारी एवं मुस्लिम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: मुनाफ़िक़ (पाखंडी) की तीन निशानियाँ हैं: ''-उनमें से एक यह बताया कि- जब बात करे तो झूठ बोले और जब वचन दे तो वचन न निभाए''। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 10: स़ब्र अर्थात धैर्य के कितने प्रकार हैं?

उत्तर- - अल्लाह तआला के अनुपालन पर धैर्य।
- गुनाह न करने पर धैर्य।
कष्टदायक भाग्यों (तक़दीरों) पर धैर्य, और हर हाल में अल्लाह की प्रशंसा करना।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلصَّـبِرِينَ) ''अल्लाह तआला धैर्य रखने वालों से मुहब्बत करता है''। [सूरा आले-इमरान: 146] तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: मोमिन का मामला भी बड़ा अजीब है। उसके हर काम में उसके लिए भलाई है। जबकि यह बात मोमिन के सिवा किसी और के साथ नहीं है। यदि उसे ख़ुशहाली प्राप्त होती है और वह शुक्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है, और अगर उसे तकलीफ़ पहुँचती है और सब्र करता है, तो यह भी उसके लिए बेहतर है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 11: धैर्य का विलोम क्या है?

उत्तर- यह अल्लाह के अनुपालन पर सब्र न करना, गुनाह को त्यागने पर सब्र न करना तथा भाग्यों पर रोष व्यक्त करना, चाहे बातों से हो या हरकतों से।
उसके प्रकारों में से है:

* मौत की तमन्ना करना।
* गालों एवं कपोलों पर मारना।
* कपड़ा फाड़ना।
*अपने अवसाद को व्यक्त करना।
* अपने हलाक होने की दुआ करना।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: निश्चय ही बड़ा बदला बड़ी परीक्षा के साथ है। जब अल्लाह किसी समुदाय से प्रेम करता है, तो उसकी परीक्षा लेता है। अतः, जो अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट रहेगा, उससे अल्लाह प्रसन्न होगा और जो असंतुष्टी दिखाएगा, उससे अल्लाह नाराज रहेगा''। इसे तिरमिज़ी और इब्ने माजह ने रिवायत किया है।

प्रश्न 12: सहयोग किसे कहते हैं?

उत्तर- हक़ एवं भलाई के आधार पर लोगों के साथ सहयोग करना।
सहयोग के प्रकार:

* अधिकार वाले का अधिकार लौटाने में सहयोग।
* अत्याचार को रोकने में सहयोग।
* लोगों और ग़रीबों की ज़रूरतें पूरी करने में सहयोग।
* हर भलाई के काम में सहयोग।
* गुनाह तथा तकलीफ़ पहुँचाने या दुश्मनी के कामों में सहयोग न करना।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَى وَلَا تَعَاوَنُوا عَلَى الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ) الْعِقَابِ) ''नेकी और तक़वा में एक दूसरे की सहायता करते रहो और गुनाह तथा अन्याय में मदद न करो ओर अल्लाह तआला से डरते रहो निस्संदेह अल्लाह तआला कठिन यातना देने वाला है''। [सूरा अल-माइदा: 2] नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: एक मोमिन दूसरे मोमिन के लिए भवन की तरह है, जिसकी एक ईंट दूसरी ईंट को ताक़त प्रदान करती है''। बुख़ारी एवं मुस्लिम और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: "एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। इसलिए न वो उसपर ज़ुल्म करे और न ही उसे ज़ुल्म के हवाले करे। जो आदमी अपने भाई की ज़रूरत पूरी करने में लगा रहता है, अल्लाह उसकी मुराद पूरी करने में लगा रहता है, और जो आदमी किसी मुसलमान की मुसीबत दूर करता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसकी मुसीबत दूर करेगा, और जो आदमी मुसलमान का दोष छुपाएगा, क़यामत के दिन अल्लाह उसके दोषों को छुपाएगा"। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 13: हया (शर्म, लज्जा) के कितने प्रकार हैं?

उत्तर- 1- अल्लाह से हया, और वह इस प्रकार कि उस पाक अल्लाह की अवज्ञा न करना।
2- लोगों से हया, इनमें से अश्लील और फ़िजूल बातों को छोड़ना और निजी अंगों को खुला न छोड़ना शामिल है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है:
ईमान की सत्तर से कुछ अधिक -साठ से कुछ अधिक- शाखाएँ हैं, जिनमें सर्वश्रेष्ठ शाखा 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना है, जबकि सबसे छोटी शाखा रास्ते से कष्टदायक वस्तु को हटाना है, तथा हया भी ईमान की एक महान शाखा है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 14: दया के प्रकारों का उल्लेख करें?

उत्तर- बड़ों पर कृपा करना एवं उनका सम्मान करना।
- छोटों एवं बच्चों पर दया करना।
- निर्धनों, ग़रीबों एवं ज़रूरतमंदों पर दया करना।
- जानवर पर दया करना, कि उसे खाना देना और कष्ट न देना।
जैसा कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फ़रमान है:
ईमान वालों का उदाहरण, उनके एक-दसरे से प्रेम, दया और करुणा में, शरीर की तरह है कि जब उसका कोई अंग तकलीफ़ में होता है, तो पूरा शरीर जागने एवं बुख़ार की तकलीफ़ में उसके साथ होता है''। बुख़ारी एवं मुस्लिम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: दया करने वालों पर रहमान (अल्लाह) दया करता है। धरती वालों पर दया करो, आकाश वाला तुम पर दया करेगा''। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 15: मुहब्बत के कितने प्रकार हैं?

उत्तर: - अल्लाह तआला से मुहब्बत।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَالَّذِينَ آَمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِلَّهِ) ''और ईमान वाले अल्लाह से अत्यंत मुहब्बत करते हैं''। [सूरा अल-बक़रा: 165]
- रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुहब्बत।
आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया: क़सम है उस अल्लाह की जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम में से कोई उस समय तक (पूर्ण) मोमिन नहीं हो सकता है जब तक कि उसके निकट मैं उसके माता-पिता एवं औलाद से अधिक प्रिय न हो जाऊँ''। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
मोमिनों से मुहब्बत, और इस तरह कि उनके लिए वही पसंद करे जो अपने लिए पसंद करता है।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
"कोई व्यक्ति उस समय तक (मुकम्मल) मोमिन नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही चीज न चाहे जो अपने लिए चाहता है"। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 16: प्रफुल्लता किसे कहते हैं?

उत्तर- जो लोगों के साथ मिलते समय चेहरे की चमक, प्रसन्नता, मुस्कुराहट और नरमी लिए हुए हो तथा लोगों से भेंट करते समय ख़ुशी प्रकट करे।
इसका उल्टा लोगों के सामने मुंह बिसूरने को कहते हैं, जिससे लोग भागते हैं।
लोगों के साथ हंस कर मिलने के महत्व पर बहुत सारी हदीस़ें आई हैं, चुनाँचे हज़रत अबू ज़र्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि मुझ से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: किसी भी नेकी के काम को कदापि तुच्छ न जानो, चाहे इतना ही क्यों न हो कि तुम अपने भाई से हँसते हुए मिलो''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: अपने भाई के सामने मुस्कुराना भी स़दक़ा है''। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 17: ईर्ष्या क्या है?

उत्तर- यह दूसरों से नेमत के ख़त्म हो जाने की अभिलाषा रखना या दूसरों को नेमत मिलने को घृणा की दृष्टि से देखना है।
अल्लाह तआला का फ़रमान है:
(وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ) ''ईर्ष्या करने वाले की ईर्ष्या से तेरी शरण माँगता हूँ''। [सूरा अल-फ़लक़: 5]
अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: एक दूसरे से नफ़रत न करो, न हसद करो, और न ही मुंह फेरो, और सब -अल्लाह के बंदे- भाई भाई हो जाओ''। इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 18: इस्तिहज़ा (उपहास) क्या है?

उत्तर- यह अपने मुस्लिम भाई का मज़ाक उड़ाना और उससे नफ़रत करना है। तथा यह जायज़ नहीं है।
अल्लाह तआला ने इससे मना करते हुए कहा है:
(يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَومٌ مِنْ قَوْمٍ عَسَى أَنْ يَكُونُوا خَيْرًا مِنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِنْ نِسَاءٍ عَسَى أَنْ يَكُنَّ خَيْرًا مِنْهُنَّ وَلَا تَلْمِزُوا أَنْفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ وَمَنْ لَمْ يَتُبْ فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ) "हे लोगो जो ईमान लाए हो! हँसी न उड़ाए कोई जाति किसी अन्य जाति की। हो सकता है कि वह उनसे अच्छी हो और न नारीयां अन्य नारियों की। हो सकता है कि वह उनसे अच्छी हों तथा आक्षेप न लगाओ एक-दूसरे को और न किसी को बुरी उपाधि दो। बुरा नाम है अपशब्द ईमान के पश्चात्, और जो क्षमा न माँगें, तो वही लोग अत्याचारी हैं''। [सूरा अल-हुजुरात: 11]

प्रश्न 19: विनम्रता क्या है?

उत्तर- विनम्रता यह है कि इंसान अपने आपको दूसरे से उच्च न समझे, न वह लोगों को कम आंके और न ही सत्य का इंकार करे।
महान अल्लाह ने कहा है:
(وَعِبَادُ الرَّحْمَنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا) ''अल्लाह के बन्दे धरती पर नरमी के साथ चलते हैं''। [सूरा अल-फ़ुरक़ान: 63] अर्थात विनम्र होकर चलते हैं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: जो कोई अल्लाह के कारण विनम्र हो जाता है तो अल्लाह तआला उसे ऊँचा कर देता है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: अल्लाह तआला ने मेरी ओर वह़्य की है कि तुम लोग विनम्रता धारण करो, यहाँ तक कि कोई किसी को घमंड न दिखाए और न कोई किसी पर अत्याचार करे''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 20: हराम घमंड के कितने प्रकार हैं?

उत्तर- 1- सत्य के विरूद्ध घमंड, वह इस प्रकार कि सत्य को नकार देना एवं उसे स्वीकार न करना।
2- लोगों के विरुद्ध घमंड, और वह इस प्रकार कि उन्हें कम आंकना, तुच्छ समझना एवं उनका मज़ाक़ उड़ाना।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है:
वह व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, जिस के दिल में रत्ती बराबर भी अहंकार होगा'' तो एक आदमी ने कहा: उस व्यक्ति का क्या जो चाहता है कि उसके पास अच्छे कपड़े हों अच्छे जूते हों? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: अल्लाह सुन्दर है एवं सुन्दरता को पसंद करता है, और घमंड तो यह है कि (अपने आपको बड़ा समझते हुए) सत्य का इंकार कर दे एवं लोगों को कमतर समझे''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
- ''हदीस़ के शब्द ''बत़रुल हक़'' का अर्थ है, हक़ अर्थात सत्य को रद्द कर देना।
- और ''ग़म्त़ुन नासि" का अर्थ है लोगों को तुच्छ समझना।
- अच्छा कपड़ा पहनना या अच्छा जूता पहनना घमंड नहीं है।

प्रश्न 21: हराम तथा वर्जित धोखा की कुछ क़िस्मों का वर्णन करें?

उत्तर- बेचने एवं ख़रीदने में धोखा, और यह सामान के अवगुण को छुपाना है।
- इल्म सीखने में धोखा, जैसे कि छात्रों का परीक्षाओं में धोखा करना।
- बातों में धोखा, जैसे कि झूठी गवाही देना।
- कही हुई बात या लोगें के साथ जिसपर सहमत हों, उसे पूरा न करना।
धोखा से मनाही के बारे में यह हदीस़ स्पष्ट है कि एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक अनाज के ढ़ेर से होकर गुज़रे, आपने अपना हाथ उसमें घुसाया तो आपकी उंगलियाँ भीग गईं, तो आपने फरमाया: ''हे इस अनाज के मालिक, यह क्या है''? तो उसने कहा: इसमें बारिश पड़ गई थी ऐ अल्लाह के रसूल, तो आपने फरमाया: क्या तुम इसे ऊपर नहीं रख सकते थे ताकि लोग इसे देख लेते?! जो धोखा दे वह मुझ में से नहीं है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
हदीस़ में उल्लेखित शब्द ''अस़-स़ुब्रा'' का अर्थ है अनाज का ढ़ेर।

प्रश्न 22: ग़ीबत (Backbiting) क्या है?

उत्तर- यह अपने मुस्लिम भाई के बारे में उसके पीठ पीछे वह कहना है जिसे वह नापसंद करे।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَلَا يَغْتَبْ بَعْضُكُمْ بَعْضًا أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَنْ يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَحِيمٌ) ''तुम में से कोई किसी की ग़ीबत न करे, क्या तुम में से कोई पसंद करेगा कि वह अपने मुर्दे भाई का मांस खाए, तुम अवश्य इसे नापसंद करोगे, और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह बड़ा क्षमा स्वीकार करने वाला एवं बड़ा दयालु है''। [सूरा अल-हुजुरात: 12]

प्रश्न 23: चुगली क्या है?

उत्तर- यह लोगों के बीच झगड़ा पैदा करने के लिए बातों को इधर-उधर करते फिरना है।
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है:
चुगली करने वाला व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 24: आलस क्या है?

उत्तर- भलाई का काम या जो काम करना इंसान पर वाजिब है, उसे बोझल मन से करना।
जैसे कि:
वाजिब कामों को करने में सुस्ती दिखाना।
उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है: (إِنَّ الْمُنَافِقِينَ يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَهُوَ خَادِعُهُمْ وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى يُرَاءُونَ النَّاسَ وَلَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ إِلَّا قَلِيلًا) “बेशक मुनाफ़िक़ लोग अल्लाह से चालबाज़ियाँ कर रहे हैं और वह उन्हें इस चालबाज़ी का बदला देने वाला है, और जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो बड़ी काहिली की हालत में खड़े होते हैं, सिर्फ़ लोगों को दिखाते हैं, और अल्लाह को याद तो यूँ ही नाम के वास्ते करते हैं”। [सूरा अल-निसा: 142]
मुसलमानों को सुस्ती, काहिली, ग़फ़लत एवं आलस से बाहर आना चाहिए एवं इस दुनिया में हर उस काम व अमल के लिए कोशिश करनी चाहिए जिससे अल्लाह राज़ी हो।

प्रश्न 25: क्रोध के कितने प्रकार हैं?

उत्तर- 1- प्रशंसनीय क्रोध: जब काफ़िर एवं पाखंडी इत्यादि लोग अल्लाह की वर्जनाओं का उल्लंघन करे, उस समय जो ग़ुस़्स़ा आए तो उसे प्रशंसनीय ग़ुस़्स़ा कहते हैं।
2- निंदनीय क्रोध: यह ऐसा क्रोध है जो इंसान को वह कहने या करने पर उकसाए जो उचित नहीं है।
निंदनीय क्रोध का इलाज:
वुज़ू।
यदि खड़े हों तो बैठ जाएं और यदि बैठे हों तो लेट जाएं।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वसीयत ''क्रोधित मत हो'' पर अमल करें।
गुस्सा के समय अपने आप पर क़ाबू रखें।
बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण माँगें।
चुप हो जाएं।

प्रश्न 26: जासूसी क्या है?

उत्तर- लोगों के राज़ की बातों या जिसे वह छुपाते हैं, उन बातों के पीछे पड़ना और उन्हें सरे आम लाना।
उसके हराम प्रकारों में से हैं:

- घरों में लोगों की ढकी-छुपी बातों की जानकारी प्राप्त करना।
- लोगों की जानकारी के बिना उनकी बातों को सुनना।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَلَا تَجَسَّسُوا ...) “और तुम जासूसी न करो”। [सूरा अल-हुजुरात: 12]

प्रश्न 27: इस्राफ़ (फ़िजूल खर्ची) क्या है? कंजूसी क्या है? और उदारता किसे कहते हैं?

उत्तर- इस्राफ़: अर्थात फ़िजूल ख़र्ची, धन को बिना ज़रूरत के ख़र्च करना है।
इसके विपरीत कंजूसी है, जो ज़रूरत पर भी ख़र्च न करने को कहते हैं।
सही रास्ता इन दोनों के बीच है, और यह कि मुसलमान को खुले हाथ वाला होना चाहिए।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَٱلَّذِينَ إِذَاۤ أَنفَقُوا لَمۡ يُسۡرِفُوا وَلَمۡ يَقۡتُرُوا وَكَانَ بَيۡنَ ذَ لِكَ قَوَامًا) ''तथा जो खर्च करते समय फ़िज़ूल-खर्ची नहीं करते और न कंजूसी करते हैं। और वह इसके बीच संतुलित राह अपनाते हैं''। [सूरा अल-फ़ुरक़ान: 67]

प्रश्न 28: कायरता क्या है? और बहादुरी किसे कहते हैं?

उत्तर- कायरता यह है कि इंसान उससे डरे जिससे डरना उचित नहीं है।
जैसे कि सत्य बात कहने एवं बुराई का इंकार करने से डरना।
बहादुरी या साहस:
और वह हक़ के लिए आगे बढ़ना है, जैसे कि इस्लाम एवं मुसलमानों की रक्षा के लिए जिहाद के मैदान में आगे बढ़ना।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी दुआ में कहा करते थे:
ऐ अल्लाह! मैं कायरता से तेरी शरण माँगता हूँ''। तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है: शक्तिशाली मोमिन कमज़ोर मोमिन के मुकाबले में अल्लाह के समीप अधिक बेहतर तथा प्रिय है, जबकि भलाई दोनों के अंदर मौजूद है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 29: ज़ुबान से निकलने वाली कुछ हराम बातों का उल्लेख करें?

उत्तर- किसी को लानत करना या गाली देना।
- यह कहना कि अमुक व्यक्ति ''जानवर'' है, या इसी प्रकार के शब्द।
- निजी अंगों का उल्लेख ग़लत एवं घटिया शब्दों के साथ करना।
- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन सभी बातों से मना फ़रमाया है, आप का कथन हैः मोमिन ताना देने वाला, लानत करने वाला, बदज़ुबान और फ़िजूल बकने वाला नहीं होता है''। इसे तिरमिज़ी और इब्ने हिब्बान ने रिवायत किया है।

प्रश्न 30: उन साधनों का उल्लेख करें जिनके द्वारा मुसलमानों में अच्छे आचरण पैदा किए जा सकते हैं?

उत्तर- 1- अल्लाह से दुआ करना कि वह उन्हें अच्छे आचरण से नवाज़ दे एवं उसको अपनाने में उनकी मदद करे।
2- अल्लाह तआला को हमेशा ध्यान में रखना तथा इस बात का सदेव ध्यान रहे कि अल्लाह तआला देख रहा है, सुन रहा है और वह सब कुछ जानता है।
3- अच्छे आचरण के प्रतिफल को याद रखना, कि यह जन्नत में प्रवेश करने का कारण है।
4- बुरे व्यवहार के बुरे अंजाम को सामने रखना, कि यह जहन्नम में ले जाने का कारण है।
5- अच्छा व्यवहार अल्लाह की मुहब्बत एवं सृष्टि की मुहब्बत का कारण है, जबकि बुरा व्यवहार अल्लाह की नफ़रत एवं सृष्टि की नफ़रत का कारण है।
6- नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जीवनी पढ़ना एवं उसका अनुसरण करना।
7- अच्छे लोगों के साथ रहना एवं बुरे लोगों से बचना।

दुआ-अज़कार खंड43

प्रश्न 1: ज़िक्र का क्या महत्व है?

नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है: "उस व्यक्ति का उदाहरण जो अपने रब को याद करता हो और जो अपने रब को याद न करता हो, जीवित और मृत की तरह है"। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।
यह इसलिए कि मानवीय जीवन का मूल्य उसके द्वारा अल्लाह को याद करने के हिसाब से तय होता है।

प्रश्न 2: ज़िक्र के कुछ लाभों का उल्लेख करें?

उत्तर- 1- इससे अल्लाह ख़ुश होता है।
2- शैतान भागता है।
3- मुसलमान बुराइयों से सुरक्षित रहता है।
4- इससे प्रतिफल, पुण्य एवं बदला मिलता है।

प्रश्न 3: सबसे श्रेष्ठ ज़िक्र क्या है?

उत्तर- सर्वश्रेष्ठ ज़िक्र ला इलाहा इल्लल्लाह अर्थात ''अल्लाह के सिवा कोई (वास्तविक) पूज्य नहीं'' कहना है। इसे तिरमिज़ी और इब्ने माजह ने रिवायत किया है।

प्रश्न 4: नींद से जागने के बाद आप क्या कहते हैं?

उत्तर- "अल्ह़म्दुलिल्लाहिल्लज़ी अह्याना बादा मा अमातना, व इलैहिन नुशूर'' (सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने हमें मृत्यु के पश्चात जीवन दिया और उसी की ओर लौटकर जाना है)"। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 5: आप कपड़ा पहनते समय क्या दुआ पढ़ते हैं?

"अल्ह़म्दुलिल्लाहिल्लज़ी कसानी हाज़स़् स़ौबा व र,ज़,क़,नीहि मिन ग़ैरि हौलिम मिन्नी वला क़ुव्वह'' (सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह कपड़ा पहनाया और मुझे कपड़ा प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य)। इस हदीस़ को अबू दावूद और तिरमिज़ी आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 6: कपड़ा निकालते समय आप क्या कहते हैं?

उत्तर- ''बिस्मिल्लाहि''। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 7: नया कपड़ा पहनने की दुआ क्या है?

उत्तर- "अल्लाहुम्मा लकल हम्दु अन्ता कसौतनीहि. अस्अलुका ख़ैरहुू व ख़ैरा मा सुनिअ लहू, व अऊज़ुबिका मिन शर्रिहि व शर्रि मा स़ुनिअ लहू'' (ऐ अल्लाह! सारी प्रशंसा तेरी है कि तू ने मुझे यह कपड़ा पहनाया। मैं तुझसे इस कपड़े की भलाई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी भलाई माँगता हूँ। इसी तरह मैं इसकी बुराई तथा जिस काम के लिए इसे बनाया गया है, उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ)। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 8: दूसरे को नया कपड़ा पहने देखकर क्या कहें?

उत्तर- जब आप किसी दूसरे को नया कपड़ा पहने देखें तो उसके लिए यह दुआ करें: "तुब्ली व युख़लिफ़ुल्लाहु तआला'' (तुम इसे पहन कर पुराना करो और इसके बाद तुम्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह नया कपड़ा दे)। इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है।

प्रश्न 9: शौचालय जाने की दुआ का वर्णन करें?

उत्तर- ''अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ुबिका मिनल ख़ुबुस़ि वल ख़बाइस़ि'' (ऐ अल्लाह, मैं नापाक जिन्नों और नापाक जिन्नियों से तेरी शरण माँगता हूँ)। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 10: शौचालाय से निकलते समय क्या दुआ कहें?

उत्तर- ''ग़ुफ़रानका'' (हे अल्लाह, हम तेरी क्षमा चाहते हैं)। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 11: वुज़ू करने से पूर्व क्या दुआ कहें?

उत्तर- ''बिस्मिल्लाह''। इस हदीस को अबू दावूद आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 12: वुज़ू के बाद की दुआ क्या है?

"अशहदु अल ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़दहू ला शरीका लहू, व अशहदू अन्ना मुह़म्मदन अब्दुहू व रसूलुहू" (मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है तथा गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके बंदे तथा रसूल हैं)। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 13: घर से निकलने की दुआ क्या है?

"बिस्मिल्लाहि. तवक्कल्तु अलल्लाहि, वला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि'' (मैं अल्लाह का नाम लेकर निकलता हूँ। मैंने अल्लाह पर भरोसा किया है। अल्लाह के सिवा न कोई शक्ति है जो भलाई का सामर्थ्य प्रदान करे और न कोई ताक़त है जो बुराई से बचाए) इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 14: घर में प्रवेश करने की दुआ क्या है?

उत्तर- "बिस्मिल्लाहि वलजना. व बिस्मिल्लाहि ख़रजना. व अलल्लाहि रब्बिना तवक्कलना'' (अल्लाह के नाम के साथ हम अंदर आए और अल्लाह के नाम के साथ हम बाहर निकले तथा हमने अल्लाह ही पर जो हमारा रब है भरोसा किया) फिर अपने घर वालों को सलाम करे। इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है।

प्रश्न 15: मस्जिद में प्रवेश करने की दुआ क्या है?

उत्तर- ''अल्लाहुम्म् इफ़्तह ली अब्वाबा रहमतिका'' (ऐ अल्लाह, तू मेरे लिए अपनी रहमत का दरवाज़ा खोल दे)। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 16: मस्जिद से निकलने की दुआ क्या है?

उत्तर- ''अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका मिन फ़ज़लिका'' (हे अल्लाह, मैं तेरी ही कृपा का प्रार्थी हूँ)। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 17: अज़ान सुनते समय क्या कहते हैं?

उत्तर- वैसा ही कहें जैसा मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाला) कहता है, सिवाय ''हय्या अलस़ स़लात'' तथा ''हय्या अलल फ़लाह'' में। यह सुनने के बाद "ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह'' कहा जाएगा। बुख़ारी एवं मुस्लिम।

प्रश्न 18: अज़ान के बाद क्या कहें?

उत्तर- ''नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद पढ़ें''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। तथा कहें "अल्लाहुम्मा रब्बा हाज़िहिद् दअ्वतित् ताम्मति, वस़्स़लातिल क़ाइमति, आति मुहम्मदनिल-वसीलता वल फ़ज़ीलता, वब्अस़्हू मक़ामम महमूदनिल्लज़ी वअत्तहू'' (ऐ अल्लाह! इस संपूर्ण आह्वान तथा खड़ी होने वाली नमाज़ के रब! मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को वसीला (जन्नत का सबसे ऊँचा स्थान) और श्रेष्ठतम दर्जा प्रदान कर और उन्हें वह प्रशंसनीय स्थान प्रदान कर, जिसका तू ने उन्हें वचन दिया है। निश्चय ही तू वचन नहीं तोड़ता)। (बुख़ारी)।
अज़ान और नमाज़ खड़ी होने के बीच के समय दुआ करे, क्योंकि इस समय की गई दुआ रद्द नहीं होती है।

प्रश्न 15: स़ुबह व शाम के क्या अज़कार हैं?

उत्तर- आयतुल कुर्सी पढ़ें: "अल्लाहु ला इलाहा इल्ला हुवल-ह़य्युल क़य्यूम ला तअख़ुज़ुहु सिनतुन वला नौम लहू माफ़िस समावाति वमा फ़िल-अर्ज़ि मन ज़ल्लज़ी यशफ़उ इंदहू इल्ला बि-इज़निही यअलमु मा बैना ऐदीहिम वमा ख़लफ़हुम वला युहीत़ूना बि शैईम मिन इल्मिही इल्ला बिमा शाआ वसिआ कुर्सिय्युहुस् समावाती वल-अर्ज़ि वला यऊदुहू हिफ़ज़ुहुमा वहुवल अलिय्युल अज़ीम", जिसका अनुवाद हैः "अल्लाह के सिवा सत्य कोई पूज्य नहीं, वह सदा ज़िन्दा एवं कायनात की तदबीर करने वाला है। उसे ऊँघ या नींद नहीं आती। आकाश और धरती में जो कुछ है, सब उसी का है। कौन है, जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना अनुशंसा (सिफ़ारिश) कर सके? जो कुछ उनके समक्ष और जो कुछ उनसे ओझल है, वह सब जानता है। लोग उसके ज्ञान में से उतना ही जान सकते हैं, जितना वह चाहे। उसकी कुर्सी आकाश तथा धरती को समोए हुए है। उन दोनों की रक्षा उसे नहीं थकाती। वही सर्वोच्च एवं महान है"। [सूरा अल-बक़रा: 255] 2- फिर बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम "शुरू अल्लाह के नाम से, जो बड़ा दयालु एवं बड़ा कृपावान है" कह कर सूरा इख़्लास़ पढ़ेंः (क़ुल हुवल्लाहु अह़द) "आप कह दीजिए कि वह अल्लाह एक है"। (अल्लाहुस़्स़मद) "अल्लाह बेनियाज है"। (लम यलिद व लम यूलद) "न उस ने (किसी को) जना है, और न (किसी ने) उसको जना है"। (व लम यकुल लहु कुफ़ुवन अह़द) "और न उसके बराबर कोई है"। तीन बार। फिर बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम (अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है) पढ़ कर सूरा फ़लक़ पढ़ेंः (क़ुल अऊज़ु बि रब्बिल फ़लक़) "(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं सुबह के रब की शरण में आता हूँ"। (मिन शर्रि मा ख़लक़) "उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की है"। (मिन शर्रि मा ख़लक़) "उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की है"। (व मिन शर्रिन नफ़्फ़ास़ाति फ़िल उक़द) "तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से"। (व मिन शर्रि ह़ासिदन इज़ा ह़सद) "तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे"। तीन बार। फिर बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम (अल्लाह के नाम से, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है) कहने के पश्चातः सूरा नास पढ़ेंः (क़ुल अऊज़ु बि रब्बिन्नासि) "(ऐ नबी!) कह दीजिए कि मैं शरण में आता हूँ मनुष्यों के रब की "। (मलिकिन्नासि) "और लोगों के मालिक की"। (इलाहिन्नासि) "और लोगों के माबूद की"। (मिन शर्रिल वसवासिल ख़न्नासि) "भ्रम डालने वाले और छुप जाने वाले की बुराई से"। (अल्लज़ी युवसविसु फ़ी स़ुदूरिन्नासि) (जो लोगों के दिलों में भ्रम डालता है)। (मिनल जिन्नति वन्नासि) (जो जिन्नों में से है और मनुष्यों में से भी)। तीन बार। अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी ला इलाहा इल्ला अन्ता खलक़तनी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअदिका मसतात़अतु अऊज़ु बिका मिन शर्रि-मा स़नअतु अबूउ लका बि निअमतिका अलैया व अबूउ बि ज़न्बी फग़फ़िर ली फ़इन्नहु ला यग़फ़िरुज़-ज़ुनूबा इल्ला अन्ता, "ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तूने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कुकृत्य से तेरी शरण में आता हूँ, जो मैंने किया है। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ। तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है"। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 20: आप सोते समय क्या कहते हैं?

"बिस्मिका अल्लाहुम्मा अमूतु व अह्या'' (ऐ अल्लाह! मैं तेरे ही नाम से मरता हूँ और जीता हूँ)। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 21: खाना खाने से पहले क्या कहते हैं?

उत्तर- ''बिस्मिल्लाह''।
यदि शुरू में कहना भूल जाएं तो कहें:

बिस्मिल्लाहि फ़ी अव्वलिही व आख़िरिही''। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 22: खाना समाप्त करने के बाद क्या कहते हैं?

"अल्ह़म्दुलिल्लाहिल्लज़ी अत़अमनी हाज़ा व रज़क़नीहि मिन ग़ैरि हौलिम मिन्नी वला क़ुव्वह'' (सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खिलाया और मुझे कपड़ा प्रदान किया, जबकि मेरे पास न कोई शक्ति है और न सामर्थ्य)। इस हदीस को अबू दावूद और इब्ने माजह आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 23: अतिथि को मेज़बान के लिए क्या दुआ करनी चाहिए?

"अल्लाहुम्मा बारिक लहुम फीमा रज़क़्तहुम, वग़्फ़िर लहुम, वरह़महुम'' (ऐ अल्लाह! तू ने इन्हें जो रोज़ी दी है, उसमें बरकत दे, इन्हें क्षमा कर और इनपर कृपा कर)। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 24: जब छींक आए तो क्या कहना चाहिए?

उत्तर- ''अल्ह़म्दुलिल्लाह'' (निःसंदेह सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है)।
3- उसका भाई या जो उसके साथ है वह ''यरह़मुकल्लाह'' (अल्लाह आप पर रहम करे) कहे।
यह सुनकर छींकने वाला फिर ''यहदिकुमुल्लाहु व युस़लिहु बालकुम'' कहेगा, अर्थात अल्लाह आपको सुपथ दिखाए एवं आपके मामला को सही करे। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 25: किसी सभा को स्थापित या समाप्त करते समय ''सभा की क्षमा की दुआ'' क्या है?

उत्तर- ''सुब्ह़ानकल्लाहुम्मा व बिह़म्दिका, अश्हदु अल ला इलाहा इल्ला अन्ता, अस्तग़्फ़िरुका व अतूबु इलैका'' "हे अल्लाह, तू पाक है, सारी प्रशंसा तेरी ही है, मैं गवाही देता हूँ कि तेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, मैं तुझ से ही क्षमाप्रार्थी हूँ, और तेरे पास ही लौट कर आता हूँ''। इस हदीस़ को अबू दावूद और तिरमिज़ी आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 26: सवार होने की क्या दुआ है?

उत्तर- बिस्मिल्लाहि, वल्ह़म्दुलिल्लाहि ((सुबहानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा वमा कुन्ना लहू मुक़रिनीन, व इन्ना इला रब्बिना लमुनक़लिबून)), ''अल्ह़म्दुलिल्लाहि, अल्ह़म्दुलिल्लाहि, अल्ह़म्दुलिल्लाहि, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, सुब्ह़ानकल्लाहुम्मा इन्नी ज़लम्तु नफ़्सी फ़ग़्फ़िर ली, फ़इन्नहु ला यग़्फ़िरुज़ ज़ुनूबा इल्ला अन्ता'' (शुरू अल्लाह के नाम से, सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए, ((पाक है वह ज़ात जिसने हमारे लिए इसको वश में किया, वरना हम इसको क़ाबू में नहीं कर सकते थे, और हम सबको हमारे रब की तरफ ही लौट कर जाना है)), सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, सभी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है,, हे अल्लाह पाक है तेरी ज़ात, मैं ने अपने आप पर अत्याचार किया है, तू मुझे क्षमा कर दे, इस लिए कि तेरे अलावा कोई अन्य गुनाहों को क्षमा नहीं कर सकता है)। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 27: यात्रा करने की दुआ का उल्लेख करें?

उत्तर- अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, (सुब्ह़ानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा व मा कुन्ना लहु मुक़्रिनीना, व इन्ना इला रब्बिना लमुन्क़लिबूना), अल्लाहुम्मा इन्ना नसअलुका फ़ी सफ़रिना हाज़ा अल-बिर्रा वत्तक़्वा व मिनल अमलि मा तर्ज़ा, अल्लाहुम्मा हव्विन अलैना स,फ़,रना हाज़ा वत़्वे अन्ना बुअदहु, अल्लाहुम्मा अन्तस़्स़ाह़िबु फ़िस्सफ़रि वल ख़लीफ़तु फ़िल अह्लि, अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका मिन वअस़ाइस्सफ़रि व कआबतिल मन्ज़रि व सूइल मुन्क़लबि फ़िल मालि वल-अह्लि, ''अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, ((पाक है वह ज़ात जिसने हमारे लिए इसको वश में किया, वरना हम इसको क़ाबू में नहीं कर सकते थे, और हम सबको हमारे रब की तरफ ही लौट कर जाना है)) हे अल्लाह, मैं तुझसे इस यात्रा में नेकी और तेरे तक़्वा (धर्मपरायणता, बुराई से दूरी) की माँग करता हूँ, और उस काम की जिससे तू राज़ी हो, हे अल्लाह, तू हमारे लिए इस यात्रा को आसान बना दे, और हमारी मंजिल को निकट कर दे, हे अल्लाह तू ही इस यात्रा का साथी है, और परिवार की देख-रेख करने वाला है, हे अल्लाह मैं तेरी शरण माँगता हूँ यात्रा की परेशानी से और थकन व बीमारी से, किसी बुरे दृश्य से और जब मैं लौट कर आऊँ तो धन एवं परिवार में कोई बुरी बात देखूँ।
जब यात्रा से वापस आए, तो इन वाक्यों के साथ-साथ यह वृद्धि भी करे:
आइबूना ताइबूना आबिदूना लिरब्बिना ह़ामिदूना, "हम लौट आए तौबा करते हुए तथा अपने रब की इबादत और उसकी प्रशंसा करते हुए"। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 28: एक निवासी के लिए एक यात्री की प्रार्थना क्या है?

उत्तर- अस्तौदिउकुमुल्लाहा अल्लज़ी ला तज़ीआ वदाइउहु, "मैं तुम्हें अल्लाह के हवाले करता हूँ, जिसके हवाले की हुई चीज़ें नष्ट नहीं होती हैं"। इसे अहमद और इब्ने माजह ने रिवायत किया है।

प्रश्न 29: एक यात्री के लिए निवासी की प्रार्थना क्या है?

अस्तौदिउल्लाहा दीनका व अमानतका व ख़्वातीमा अमलिका, ''मैं तेरे धर्म, तेरी अमानत और तेरे अंतिम कर्मों को अल्लाह के हवाले करता हूँ''। इस हदीस को इमाम अहमद और तिरमिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 30: बाज़ार में प्रवेश करने की दुआ क्या है?

उत्तर- "ला इलाहा इल्लल्लाहु, वह़दहू ला शरीका लहू, लहुल् मुल्कु, व लहुल हम्दु, युह़यी व युमीतु, व हुवा हय्युन ला यमूतु, बियदिहिल ख़ैरु, वहुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर'' (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, उसी का सारा राज्य और उसी की सब प्रशंसा है, वह जीवन और मृत्यु देता है, वह अमर है कभी मरता नहीं और वह प्रत्येक चीज़ पर सामर्थ्य रखता है)। इसे तिरमिज़ी और इब्ने माजह ने रिवायत किया है।

प्रश्न 31: ग़ुस़्स़े के समय की दुआ?

उत्तर- ''अउज़ुबिल्लाहि मिनश् शैत़ानिर रजीम'' (मैं बहिष्कृत शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूं)। बुख़ारी एवं मुस्लिम

प्रश्न 31: उपकार करने वाले के लिए क्या दुआ है?

उत्तर- ''जज़ाकल्लाहु ख़ैरन'' (अल्लाह आपको अच्छा बदला दे)। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 33: वाहन के फिसलन के समय क्या दुआ पढ़ें?

उत्तर- ''बिस्मिल्लाह ''। इसे अबू दावूद ने रिवायत किया है।

प्रश्न 34: उस समय क्या कहें जब आपको ख़ुशी प्रदान करने वाला कुछ प्राप्त हो?

उत्तर- ''अल्ह़म्दुलिल्लाहिल्लज़ी बिनेमतिही ततिम्मुस़ स़ालिह़ातु'' (सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जिसके फ़ज्ल से ही सदकार्य सम्पन्न होते हैं)। इस हदीस़ को हाकिम आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 35: जब कोई अप्रिय चीज़ या बात हो जाए तो क्या कहें?

उत्तर- ''अल्ह़म्दुलिल्लाहि अला कुल्लि हाल'' (हर ह़ाल में सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है)। सहीह अल-जामेअ।

प्रश्न 36: सलाम करने एवं सलाम का जवाब देने का क्या तरीक़ा है?

उत्तर- मुसलमान कहेगा: ''अस्सलामु अलैकुम व रह़मतुल्लाहि व बरकातुहू'' (आप पर अल्लाह की सलामती, रह़मत एवं बरकत उतरे)।
तो उसका भाई जवाब देगा: ''वअलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू' (आप पर भी अल्लाह की सलामती, रहमत एवं बरकत नाज़िल हो)। इस हदीस को अबू दावूद और तिरमिज़ी आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 37: बारिश होने के समय क्या दुआ करें?

उत्तर- "अल्लाहुम्मा स़ैय्यिबन नाफ़िअन" अर्थात, ऐ अल्लाह! बारिश को लाभदायक बना दे। बुख़ारी।

प्रश्न 38: बारिश होने के बाद क्या दुआ पढ़ें?

उत्तर- ''मुत़िरना बिफ़ज़्लिल्लाहि व रह़मतिही'' (अल्लाह की कृपा एवं उसकी रहमत से बारिश हुई)। बुख़ारी एवं मुस्लिम।

प्रश्न 39: आंधी की क्या दुआ है?

उत्तर- "अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरहा व अऊज़ुबिका मिन शर्रिहा'' (ऐ अल्लाह! मैं तुझ से इसकी भलाई को माँगता हूँ और इसकी बुराई से तेरी पनाह चाहता हूँ)। इसे अबू दावूद और इब्ने माजह ने रिवायत किया है।

प्रश्न 40: बिजली कड़कने की क्या दुआ है?

उत्तर- "सुब्ह़ानल्लज़ी युसब्बिह़ुर रअ्दु बिह़म्दिही, वल मलाइकतु मिन ख़ीफ़तिहि'' (पाक व पवित्र है वह ज़ात, रअद (बादलों की निगरानी करने वाला फ़रिश्ता) जिसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करता है और फ़रिश्ते उसके भय से उसकी पवित्रता बयां करते हैं)। मुवत़्त़ा मालिक।

प्रश्न 41: किसी पीड़ित को देखने पर क्या दुआ करें?

उत्तर- "अल्ह़म्दुलिल्लाहिल् लज़ी आफ़ानी मिम्मा इब्तिलाका बिही, व फ़ज़्ज़लनी अला कस़ीरिम् मिम्मन ख़लक़ा तफ़ज़ीला'' (सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने मुझे उस विपत्ति से सुरक्षित रखा, जिसमें तुम पड़ चुके हो और मुझे अपनी बहुतेरी सृष्टियों से श्रेष्ठ बनाया)। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

प्रश्न 42: यदि किसी को डर हो कि किसी को उसकी नज़र लग सकती है तो क्या दुआ करे?

हदीस में वर्णित हैः "जब तुम में से कोई अपने भाई के अंदर, अथवा स्वयं अपने अंदर या अपने धन में कोई ऐसी बात देखे, जो उसके मन को भा जाए, तो उसके लिए बरकत की दुआ करे। क्योंकि नज़र लगना सत्य है"। इसे अहमद और इब्ने माजह आदि ने रिवायत किया है।

प्रश्न 43: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद कैसे भेजें?

"اللهُمَّ صلِّ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما صَلَّيتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد، اللهمَّ بارِكْ على محمَّدٍ وعلى آلِ محمَّدٍ كما باركتَ على إبراهيمَ وعلى آلِ إبراهيمَ، إنَّكَ حميدٌ مَجِيد" ''अल्लाहुम्मा सल्ले अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुम मजीद, अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मद, व अला आले मुहम्मद, कमा बारक्ता अला इब्राहीमा व अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुम मजीद (हे अल्लाह! मुहम्मद एवं उनकी संतान-संतति की उसी प्रकार से प्रशंसा कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी आल की प्रशंसा की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है। एवं मुहम्मद तथा उनकी संतान-संतति पर उसी प्रकार से बरकतों की बारिश कर, जिस प्रकार से तूने इब्राहीम एवं उनकी संतान-संतति पर की है। निस्संदेह तू प्रशंसा योग्य तथा सम्मानित है)। बुख़ारी एवं मुस्लिम।

विविधताओं का खंड21

प्रश्न 1: पाँच अनिवार्य प्रावधान (अह़काम -ए- तक्लीफ़िय्यह) क्या हैं?

उत्तर-
1- वाजिब।
2- मुस्तहब।
3- ह़राम।
4- मकरूह।
5- मुबाह़।

प्रश्न 2: इन पाँच प्रावधानों की व्याख्या करें?

उत्तर-
1- वाजिब: जैसे कि पाँच नमाज़ें, रमज़ान महीने का रोज़ा, माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार।
-वाजिब के करने वाले को बदला मिलेगा एवं छोड़ने वाले को सज़ा।
2- मुस्तह़ब: जैसा कि नियमित सुन्नतें, रात की नमाज़, खाना खिलाना एवं सलाम करना, इसे सुन्नत एवं मन्दूब भी कहा जाता है।
- मुस्तहब कामों के करने वाले को सवाब मिलेगा, मगर उसको छोड़ने वाले को कोई सज़ा नहीं होगी।
महत्वपूर्ण टिप्पणी:

जब कभी मुसलमान यह सुने कि यह काम सुन्नत या मुस्तहब है, तो उसे उस काम की तरफ लपकना चाहिए एवं नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पैरवी करनी चाहिए।
3- ह़राम: जैसे शराब पीना, माता-पिता की अवज्ञा करना एवं रिश्ता तोड़ना।
- ह़राम काम के छोड़ देने वाले को पुण्य मिलेगा तथा करने वाले को सज़ा।
4- मकरूह: उदाहरण स्वरूप किसी चीज़ को बायाँ हाथ से लेना या देना, नमाज़ में कपड़ा जमा करना इत्यादि।
- मकरूह काम के छोड़ देने वाले को नेकी मिलेगी, मगर करने वाले को कोई सजा नहीं मिले गी।
5- मुबाह़: जैसे कि सेब खाना, चाय पीना, इसको जायज़ या हलाल भी कहा जाता है।
- मुबाह़ या हलाल काम के छोड़ने वाले को न नेकी मिलेगी, न उसके करने वाले को कोई सज़ा।

प्रश्न 3: ख़रीद व फ़रोख़त एवं मामलात (क्रय-विक्रय तथा व्यवहार) में अस़ल क्या है?

उत्तर- हर ख़रीद व फ़रोख़त एवं मामलात में अस़ल हलाल है, मगर कुछ प्रकार ऐसे हैं जिनको अल्लाह तआला ने हराम किया है।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰاۚ) “अल्लाह ने व्यापार को हलाल तथा सूद को हराम किया है”। [सूरा अल-बक़रा: 275]

प्रश्न 4: कुछ हराम व्यापार एवं मामलात के बारे में बताएं?

उत्तर-
1- धोखा, जैसे कि सामान के दोष को छुपाना।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि एक बार नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक अनाज के ढ़ेर से होकर गुज़रे, आपने अपना हाथ उसमें घुसाया तो आपकी उंगलियाँ भीग गईं, तो आपने फरमाया: ''हे इस अनाज के मालिक, यह क्या है''? तो उसने कहा: इसमें बारिश पड़ गई थी ऐ अल्लाह के रसूल, तो आपने फरमाया: तुम इसे ऊपर नहीं रख सकते थे ताकि लोग इसे देख लेते? जो धोखा दे वह मुझ में से नहीं है''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।
2- सूद, जैसे कि कोई किसी व्यक्ति से एक हज़ार कर्ज़ ले, इस शर्त पर कि उसे दो हज़ार लौटाएगा।
जो ज़्यादा पैसा लिया गया वह सूद है, और हराम है।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰاۚ) “अल्लाह ने व्यापार को हलाल तथा सूद को हराम किया है”। [सूरा अल-बक़रा: 275]
3- छल एवं अज्ञानता, जैसे कि कहा जाए कि इस बकरी के थन में जो दूध है, मैं उसे बेच रहा हूँ, या इस तालाब में जो मछली है, मैं वह बेच रहा हूँ जबकि अभी उसका शिकार नहीं किया गया है।
हदीस़ में है कि:
''नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसी वास्तु के क्रय-विक्रय से मना किया है जिसका अंजाम मालूम न हो''। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

प्रश्न 4: आप पर अल्लाह के कुछ उपकारों का ज़िक्र करें?

उत्तर- 1- इस्लाम की नेमत, कि मैं काफ़िर में से नहीं हूँ।
2- सुन्नत की नेमत, कि मैं बिद्अतियों (नवाचारियों) में से नहीं हूँ।
3- स्वास्थ्य की नेमत, कि मेरे कान, आँख और पैर इत्यादि सब ठीक हैं।
4- खाने, पीने एवं पहनने की नेमत।
हम पर अल्लाह तआला की बहुत सारी नेमतें हैं जिनको गिना नहीं जा सकता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وإن تَعُدُّوا نِعۡمَةَ ٱللَّهِ لَا تُحۡصُوهَاۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ) ''और यदि तुम अल्लाह की नेमतों को गिनो, तो उन्हें गिन न सकोगे। निःसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दया करने वाला है''। [सूरा अन-नहल: 18]

प्रश्न 6: नेमतों के संबंध में क्या वाजिब है? और उसका शुक्र कैसे अदा करें?

उत्तर- उसका शुक्र अदा करना वाजिब है, और वह इस तरह हो सकता है कि ज़ुबान से उसकी प्रशंसा करें, कि यह तमाम फ़ज़ीलतें (अनुग्रह) उसी की हैं। फिर इन नेमतों का प्रयोग उस कार्य में करें जिससे वह राज़ी हो, न कि गुनाह के रास्ते में।

प्रश्न 7: मुसलमानों के त्योहार क्या क्या हैं?

उत्तर- ईद-उल-फ़ित़्र तथा ईद-उल-अज़्हा।
जैसा कि अनस -रज़ियल्लाहु अन्हु- की हदीस़ में है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब मदीना आए तो उनके लिए दो दिन हुआ करते थे जिनमें वे खेल-कूद करते। आपने फरमाया: ''यह दो दिन क्या हैं?'', उन लोगों ने कहा कि इन दो दिनों में हम अज्ञानता काल में खेला करते थे। तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: अल्लाह ने तुम्हें उन दो दिनों के बदले उनसे अच्छे दिन दिए हैं: अज़्हा का दिन और फ़ित़्र का दिन। इस हदीस़ को अबू दावूद ने रिवायत किया है।
इन दो दिनों के अलावा जो भी त्योहार मनाए जाते हैं वे बिद्अत हैं।

प्रश्न 8: सबसे उत्तम महीना कौन सा है?

उत्तर- रमज़ान का महीना।

प्रश्न 9: सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

उत्तर- जुमुआ का दिन।

प्रश्न 10: साल का सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

उत्तर- अरफ़ा का दिन।

प्रश्न 11: साल की सबसे उत्तम रात कौन सी है?

उत्तर- क़द्र की रात।

प्रश्न 12: जब अजनबी महिला पर नज़र पड़े तो क्या करना चाहिए?

उत्तर- नज़र नीची कर लेनी चाहिए, अल्लाह तआला ने कहा है: (قُلْ لِلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا مِنْ أَبْصَارِهِمْ) ''आप मोमिनों से कह दें कि वे अपनी नज़रें नीची कर लें''। [सूरा अन-नूर: 30]

प्रश्न 13: कौन लोग इंसान के दुश्मन हैं?

उत्तर- 1- नफ़्स-ए-अम्मारा (बुरी आत्मा), वह इस प्रकार कि इंसान उस तरफ को चले जिस तरफ उसकी आत्मा और ख्वाहिश चलने को कहे, अर्थात अल्लाह की अवज्ञा की ओर, अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: (إِنَّ ٱلنَّفۡسَ لَأَمَّارَةُۢ بِٱلسُّوۤءِ إِلَّا مَا رَحِمَ رَبِّيۚ إِنَّ رَبِّي غَفُورٌ رَّحِيمٌ) ''मन तो बुराई पर उभारता है, मगर जिस पर मेरा रब दया कर दे, बेशक मेरा रब अति क्षमाशील एवं दयावान है''। [सूरा यूसुफ: 53] 2- शैतान, वह आदम के संतान का दुश्मन है, उसका उद्देश्य इंसान को भटकाना, उसे भ्रमित करना, बुराई की ओर ले जाना एवं जहन्नम में दाखिल कराना है। अल्लाह तआला ने कहा है: (وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَ ٰ⁠تِ ٱلشَّيطَـٰنِۚ إِنَّهُۥ لَكُمۡ عَدُوٌّ مُّبِينٌ) ''और शैतान के पदचिन्ह की पैरवी न करो, वह तुम्हारा स्पष्ट दुश्मन है''। [सूरा अल-बक़रा: 168] 3- बुरे साथी, जो बुराई करने को प्रोत्साहित करते हैं और भलाई करने से रोकते हैं, अल्लाह तआला ने कहा है: (الْأَخِلَّاءُ يَوْمَئِذٍ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا الْمُتَّقِينَ) ''सभी मित्र उस दिन एक-दूसरे के शत्रु हो जायेंगे, आज्ञाकारियों के सिवा''। [सूरा अज़-ज़ुख्रुफ़: 67]

प्रश्न 14: तौबा क्या है?

उत्तर- तौबाः यह अल्लाह की अवज्ञा से उसके आज्ञापालन की ओर लौटने को कहते हैं, अल्लाह तआला ने फ़रमाया है: (وَإِنِّي لَغَفَّارٌ لِّمَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًا ثُمَّ ٱهۡتَدَىٰ) ''और मैं निश्चय ही बड़ा क्षमाशील हूँ उसके लिए, जिसने क्षमा याचना की तथा ईमान लाया और सदाचार किया फिर सुपथ पर रहा''। [सूरा ताहा: 82]

प्रश्न 15: सही तौबा की क्या शर्तें हैं?

उत्तर- 1- गुनाह को बिल्कुल त्याग देना।
2- अपने किए पर पछताना।
3- दोबारा गुनाह न करने का दृढ़ निश्चय करना।
4- अधिकारों एवं अत्याचार से ली हुई चीज़ों को उनके मालिक के हवाले करना।
अल्लाह तआला फ़रमाता हैः (وَٱلَّذِينَ إِذَا فَعَلُوا فَـٰحِشَةً أَوۡ ظَلَمُوۤا أَنفُسَهُمۡ ذَكَرُوا ٱللَّهَ فَٱسۡتَغۡفَرُوا لِذُنُوبِهِمۡ وَمَن يَغۡفِرُ ٱلذُّنُوبَ إِلَّا ٱللَّهُ وَلَمۡ يصِرُّوا عَلَىٰ مَا فَعَلُوا وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ) ''और वे ऐसे लोग हैं कि जब उनसे कोई जघन्य पाप हो जाता है या वे अपने ऊपर अत्याचार कर बैठते हैं, तो उन्हें अल्लाह याद आ जाता है। फिर वे अपने पापों के लिए क्षमा माँगते हैं, और अल्लाह के सिवा कौन है जो पापों का क्षमा करने वाला होॽ और वे अपने किए पर जान बूझकर अड़े नहीं रहते''। [सूरा आले-इमरान: 135]

प्रश्न 16: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दुरूद भेजने का क्या अर्थ है?

उत्तर- इसका अर्थ यह है कि आप अल्लाह से दुआ कर रहे हैं कि वह शीर्ष फ़रिश्तों के बीच अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा करे।

प्रश्न 17: ''सुब्ह़ानल्लाह '' का क्या अर्थ है?

उत्तर- तस्बीह़ अर्थात अल्लाह की पाकी बयान करना, अर्थात अल्लाह को हर प्रकार के अवगुण, कमी एवं बुराई से पाक व पवित्र घोषित करना।

प्रश्न 18: ''अल्ह़म्दुलिल्लाह'' का क्या अर्थ है?

उत्तर-सर्वशक्तिमान अल्लाह की स्तुति करना, और पूर्णता के सभी गुणों के साथ उसका वर्णन करना।

प्रश्न 18: ''अल्लाहु अकबर'' का क्या अर्थ है?

उत्तर- अर्थात अल्लाह पाक हर चीज़ से बड़ा है, तथा प्रत्येक वस्तु से बढ़ कर महानतम एवं सम्माननीय है।

प्रश्न 18: ''ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहि'' का क्या अर्थ है?

उत्तर- इसका अर्थ यह है कि बन्दा अपनी ताक़त एवं शक्ति से एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित नहीं हो सकता है, जो कुछ है वह अल्लाह की प्रदान की हुई है।

प्रश्न 21: ''अस्तग़्फ़िरुल्लाह'' का क्या मतलब है?

उत्तर- अर्थातः बन्दा का अपने रब से यह माँगना कि वह उसके गुनाहों को मिटा दे और उसके अवगुणों की पर्दा पोशी करे।